असम-अरुणाचल सीमा विवाद फिर बना हिंसा की वजह, 54 साल बाद भी क्यों नहीं सुलझा 800 KM का झगड़ा?

धेमाजी में सीमा विवाद ने फिर पकड़ा तूल, फायरिंग में 18 ग्रामीण घायल; 2023 के समझौते के बावजूद जमीन पर क्यों कायम है तनाव?

Knews Desk- असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच दशकों पुराना सीमा विवाद एक बार फिर हिंसक हो गया है। 10 अगस्त 2026 को असम के धेमाजी जिले में दोनों राज्यों की सीमा से जुड़े इलाके में गोलीबारी की घटना हुई, जिसमें 18 ग्रामीण घायल हो गए। इनमें चार लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर पांच दशक से ज्यादा पुराना यह विवाद अब तक पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो सका?

दोनों राज्यों के बीच करीब 800 किलोमीटर लंबी सीमा है। विवाद सिर्फ जमीन के मालिकाना हक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड, ब्रिटिश दौर के नक्शे, जनजातीय समुदायों के पारंपरिक अधिकार और अलग-अलग ऐतिहासिक दावे भी जुड़े हुए हैं।

असम और अरुणाचल के बीच सीमा विवाद की जड़ें ब्रिटिश शासन के दौर तक जाती हैं। 1873 में लागू इनर लाइन रेगुलेशन के तहत असम के मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों के बीच प्रशासनिक सीमाएं तय की गई थीं। उस समय आज का अरुणाचल प्रदेश बड़े हिस्से में असम के प्रशासनिक नियंत्रण में था।

बाद में 1950 के दशक में यह इलाका नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी NEFA के तौर पर विकसित हुआ। बोरदोलोई समिति की सिफारिशों के बाद करीब 3,648 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को असम के प्रशासनिक दायरे में शामिल किया गया। यही फैसला आगे चलकर विवाद की बड़ी वजह बना।

1972 में NEFA को अलग केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया और इसे अरुणाचल प्रदेश नाम दिया गया। इसके बाद 1987 में अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया। राज्य बनने के बाद पुराने प्रशासनिक क्षेत्रों और सीमाओं को लेकर दोनों राज्यों के बीच मतभेद और गहरा गए।

123 गांवों पर भी रहा दावा

अरुणाचल प्रदेश का कहना रहा है कि उसके जनजातीय समुदाय ऐतिहासिक रूप से जिन क्षेत्रों का इस्तेमाल करते आए हैं, उनमें से कई इलाकों को प्रशासनिक व्यवस्था के दौरान असम में शामिल कर दिया गया।

दूसरी ओर, असम मौजूदा प्रशासनिक सीमाओं और सरकारी रिकॉर्ड को आधार मानता है। इसी मतभेद के कारण कई सीमावर्ती गांव विवाद की जद में आ गए। साल 2007 में अरुणाचल प्रदेश ने 123 गांवों पर अपना दावा जताया था। ये गांव असम के आठ और अरुणाचल प्रदेश के 12 जिलों से जुड़े बताए गए थे।

1951 का फैसला क्यों बना विवाद की जड़?

सीमा विवाद में 1951 की प्रशासनिक व्यवस्था को सबसे अहम माना जाता है। उस दौरान लगभग 3,648 वर्ग किलोमीटर इलाके को असम के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया था। बाद में अरुणाचल प्रदेश ने इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा जताया।

विवाद सुलझाने के लिए 1979 में असम, अरुणाचल प्रदेश और केंद्र सरकार की भागीदारी वाली एक हाई-पावर्ड ट्राइपार्टाइट कमेटी बनाई गई। इसका मकसद पुराने नक्शों, सर्वे रिकॉर्ड और दोनों राज्यों के दावों के आधार पर सीमा का निर्धारण करना था।

1983-84 तक करीब 489 किलोमीटर सीमा का सीमांकन भी कर लिया गया, लेकिन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। अरुणाचल प्रदेश ने समिति की कुछ सिफारिशों पर आपत्ति जताई, जिसके बाद मामला लंबे समय तक उलझा रहा।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

सीमा विवाद को लेकर 1989 में असम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित क्षेत्रों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक स्थानीय सीमा आयोग का गठन किया।

इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने की। आयोग ने 2014 में अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी। रिपोर्ट में कुछ ऐसे इलाकों को अरुणाचल प्रदेश को वापस देने की सिफारिश की गई थी, जिन्हें पहले असम के हिस्से में माना गया था। हालांकि, दोनों राज्यों के बीच इस पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई।

2023 में हुआ समझौता, फिर भी खत्म नहीं हुआ विवाद

सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में अप्रैल 2023 में बड़ी पहल हुई। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने नमसाई डिक्लेरेशन पर हस्ताक्षर किए।

इसके बाद दोनों राज्यों ने संयुक्त समितियां गठित कीं और विवादित गांवों तथा इलाकों का सर्वे शुरू किया। कई क्षेत्रों को लेकर सहमति भी बनी। इससे उम्मीद जगी कि करीब पांच दशक पुराने सीमा विवाद का स्थायी समाधान निकल सकता है।

लेकिन विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। जुलाई 2023 में असम विधानसभा में सरकार की ओर से बताया गया कि राज्य के सात जिलों—सोनितपुर, बिश्वनाथ, लखीमपुर, धेमाजी, तिनसुकिया, डिब्रूगढ़ और चराइदेव—की 16 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन अरुणाचल के कब्जे में होने का मुद्दा सामने आया।

समझौते के बाद भी क्यों हो रही है हिंसा?

दरअसल, दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक स्तर पर समझौता होना और जमीन पर उसे लागू करना दो अलग-अलग बातें हैं। सीमावर्ती इलाकों में ग्रामीण लंबे समय से जंगल, खेती और दूसरी जमीनों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। कई जगह राजस्व रिकॉर्ड, वन क्षेत्र की सीमा और स्थानीय लोगों के पारंपरिक इस्तेमाल के बीच अंतर है।

ऐसे में सड़क निर्माण, खेती, जंगल की जमीन, अतिक्रमण या पुलिस कार्रवाई जैसे छोटे विवाद भी देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ा सकते हैं।

धेमाजी में हुई ताजा गोलीबारी इसी जटिल स्थिति की एक और मिसाल है। 2023 के समझौते के बावजूद जब तक जमीन पर सीमांकन, प्रशासनिक अधिकार और स्थानीय लोगों के दावों को लेकर पूरी स्पष्टता नहीं आती, तब तक असम और अरुणाचल के बीच दशकों पुराना यह विवाद पूरी तरह खत्म होना मुश्किल नजर आता है।

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