‘हुनर दिखाइए’… Handloom Day पर PM मोदी की अपील, लेकिन बनारस में क्यों बुझ रही करघों की आवाज?

KNEWS DESK- देशभर में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जा रहा है। इस अवसर से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा कर लोगों से भारतीय हथकरघा और इससे जुड़े कारीगरों को प्रोत्साहित करने की अपील की। पीएम मोदी ने कहा कि Handloom Day को उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाए और सोशल मीडिया के जरिए बुनकर भाई-बहनों की मेहनत को ज्यादा से ज्यादा लोगों के सामने लाया जाए।

प्रधानमंत्री की यह अपील ऐसे समय सामने आई है, जब उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी में पारंपरिक बुनकरों की आर्थिक स्थिति को लेकर एक रिपोर्ट सोशल मीडिया पर चर्चा में है। इस रिपोर्ट में बनारस के हजारों करघों के बंद होने से लेकर बुनकरों के दूसरे रोजगार अपनाने तक के कई दावे किए गए हैं।

बनारस में हजारों करघे बंद होने का दावा

बनारसी साड़ी की पहचान उसकी पारंपरिक बुनाई और कारीगरी से है, लेकिन इस हुनर को आगे बढ़ाने वाले कई परिवार आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर चर्चा में आई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वाराणसी में करीब 50 हजार करघे बंद हो चुके हैं।

रिपोर्ट में यह भी दावा है कि जिन मशीनों और उपकरणों पर कभी बड़ी रकम खर्च की गई थी, काम नहीं मिलने के कारण उनमें से कई अब बेहद कम कीमत पर बेचे जा रहे हैं। इसके पीछे बुनकरों की कम होती आमदनी, बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और मशीन से बने सस्ते उत्पादों को प्रमुख कारणों में गिना गया है। हालांकि, रिपोर्ट में बताए गए इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

बाहर बनी साड़ी को ‘बनारसी’ बताकर बेचने पर सवाल

बनारस के बुनकरों की एक और बड़ी चिंता स्थानीय बाजार में दूसरे शहरों से आने वाली साड़ियों को लेकर बताई जा रही है। रिपोर्ट में एक बुनकर से जुड़े दावे के मुताबिक, प्रतिदिन कई ट्रक साड़ियां वाराणसी के बाजार में पहुंचती हैं। इनमें कुछ उत्पाद सूरत समेत दूसरे शहरों में तैयार किए जाते हैं।

आरोप है कि इनमें से कुछ साड़ियों को बाद में ‘बनारसी साड़ी’ के नाम से ग्राहकों के सामने पेश किया जाता है। बुनकरों का कहना है कि उनकी आपत्ति किसी दूसरे राज्य में साड़ी तैयार किए जाने से नहीं, बल्कि दूसरे स्थान पर तैयार उत्पाद को बनारसी पहचान देकर बेचे जाने से है। ऐसी स्थिति में ग्राहक के लिए हाथ से बुनी पारंपरिक बनारसी साड़ी और मशीन से तैयार उत्पाद के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है।

कम कमाई के कारण बदल रहा पुश्तैनी पेशा

रिपोर्ट में वाराणसी के एक बुनकर शमशेर की आर्थिक स्थिति का उदाहरण भी दिया गया है। दावा है कि बुनाई से होने वाली कम आमदनी के कारण उन्होंने करीब 16 महीने पहले करघे पर काम करना बंद कर दिया और परिवार चलाने के लिए जनरल स्टोर शुरू कर दिया। पांच सदस्यों वाले परिवार के लिए करीब 200 रुपये की दैनिक मजदूरी में घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई संभालना मुश्किल बताया गया। आखिरकार उन्हें उस काम से दूरी बनानी पड़ी, जिसे उनका परिवार कई पीढ़ियों से करता आ रहा था। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ऐसे कई परिवार हैं, जिनकी नई पीढ़ी अब हथकरघा के बजाय दूसरे रोजगार की तलाश कर रही है। कुछ लोग काम बदल चुके हैं तो कुछ बेहतर रोजगार के लिए दूसरी जगहों पर चले गए।

भारत में हथकरघा क्षेत्र का महत्व केवल कला और विरासत तक सीमित नहीं है। चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना 2019-20 के आंकड़ों के अनुसार, देश में 35.22 लाख हथकरघा कामगार थे। इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी भी काफी अधिक है। जनगणना के अनुसार करीब 25.46 लाख महिला कामगार हथकरघा गतिविधियों से जुड़ी थीं। यानी कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी 72 प्रतिशत से अधिक थी। यही वजह है कि हथकरघा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

बनारसी साड़ी खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान

असली हैंडलूम बनारसी साड़ी की पहचान के लिए ग्राहकों को केवल दुकानदार के दावे पर निर्भर रहने के बजाय उत्पाद से जुड़ी जानकारी भी जांचनी चाहिए। खरीदारी के दौरान इन बातों पर ध्यान दिया जा सकता है—

  1. Handloom Mark और GI पहचान देखें: साड़ी खरीदते समय विक्रेता से Handloom Mark और संबंधित GI प्रमाण से जुड़ी जानकारी मांगें।
  2. बुनाई को ध्यान से देखें: हाथ से तैयार उत्पादों में बुनाई की बनावट मशीन से बने कपड़े की तुलना में अलग हो सकती है। हालांकि केवल धागों को देखकर प्रामाणिकता तय करना सही नहीं है।
  3. किनारों की फिनिशिंग जांचें: हथकरघा और पावरलूम की बुनाई में फिनिशिंग का अंतर दिखाई दे सकता है, लेकिन इसे अकेले असली होने का प्रमाण न मानें।
  4. जरी के बारे में जानकारी लें: विक्रेता से जरी की गुणवत्ता, उसके प्रकार और बुनाई की प्रक्रिया के बारे में पूछें। सिर्फ खुरचकर जांच करना विश्वसनीय तरीका नहीं माना जा सकता।
  5. बहुत कम कीमत पर सतर्क रहें: शुद्ध रेशम और पारंपरिक बुनाई वाली बनारसी साड़ी अगर असामान्य रूप से कम कीमत पर मिल रही है तो उसकी प्रामाणिकता और सामग्री की जांच जरूर करें।
  6. साड़ी कहां और किसने बनाई, पूछें: विक्रेता से उत्पाद के निर्माण स्थान, बुनकर या निर्माता और बुनाई की तकनीक के बारे में जानकारी मांगी जा सकती है।

असली बनारसी साड़ी की पहचान के लिए प्रमाणित टैग, विश्वसनीय विक्रेता और उत्पाद की traceability ज्यादा भरोसेमंद आधार हैं। इसलिए सिर्फ साड़ी की बनावट या कीमत देखकर उसे असली या नकली घोषित करने से बचना चाहिए।

7 अगस्त को ही क्यों मनाया जाता है Handloom Day?

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का इतिहास स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा है। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता में स्वदेशी आंदोलन से संबंधित महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुआ था। इस आंदोलन के दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और भारत में बने सामान के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया। इस ऐतिहासिक तारीख को याद करते हुए वर्ष 2015 में 7 अगस्त को पहली बार National Handloom Day मनाया गया। इसके बाद हर साल इस दिन देश के बुनकरों, कारीगरों और भारत की पारंपरिक बुनाई को सम्मान देने के लिए कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

हथकरघा क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले कारीगरों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जाता है। इनमें संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार शामिल हैं। संत कबीर का वाराणसी और बुनकर परंपरा से गहरा संबंध रहा है, इसलिए उनके नाम पर दिया जाने वाला यह सम्मान विशेष महत्व रखता है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी की सोशल मीडिया के जरिए बुनकरों की मेहनत को सामने लाने की अपील एक तरफ भारतीय Handloom को प्रोत्साहित करने का संदेश देती है। वहीं, बनारस के बुनकरों को लेकर सामने आए दावे बताते हैं कि पारंपरिक कारीगरों के सामने बाजार, उचित मजदूरी और असली उत्पाद की पहचान जैसी चुनौतियां भी मौजूद हैं।

ऐसे में Handloom Day केवल हथकरघा उत्पादों को प्रदर्शित करने का अवसर नहीं, बल्कि उन्हें बनाने वाले हाथों की आर्थिक स्थिति और उनके हुनर के भविष्य पर चर्चा करने का भी मौका है।

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