Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: भीलों के बीच सीखी तीरंदाजी, फिर बने अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा खतरा

Knews Desk– 23 जुलाई 1906 को जन्मे चंद्रशेखर आजाद महज 24-25 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए, लेकिन इतने कम समय में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी। उनका नाम सुनते ही ब्रिटिश अधिकारी सतर्क हो जाते थे। आजाद न सिर्फ अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के लिए जाने जाते थे, बल्कि अपने सटीक निशाने के लिए भी मशहूर थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने निशानेबाजी की शुरुआती सीख बचपन में ही हासिल कर ली थी। उनकी जयंती पर जानते हैं कि आखिर वह इतने कम उम्र में इतने कुशल निशानेबाज कैसे बने।

चंद्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा (अब चंद्रशेखर आजाद नगर) में हुआ था। उनका बचपन भील समुदाय के बीच बीता। भील समाज पारंपरिक रूप से तीरंदाजी और शिकार में निपुण माना जाता है। छोटे चंद्रशेखर भी उनके साथ जंगलों में जाते, धनुष-बाण चलाना सीखते और पेड़ों पर लगे फलों या दूर रखी वस्तुओं को निशाना बनाकर अभ्यास करते थे। यही अभ्यास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।बचपन में शुरू हुआ यह अभ्यास युवावस्था तक लगातार जारी रहा। भीलों के बीच रहते हुए उन्होंने न केवल निशाना साधना सीखा, बल्कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, जंगलों में तेजी से चलना और खुद को सुरक्षित रखना भी सीखा। यही गुण बाद में उनके क्रांतिकारी जीवन में बेहद काम आए।

जब चंद्रशेखर आजाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) और बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े, तब उन्हें आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण मिला। उन्होंने पिस्तौल और रिवॉल्वर चलाने में ऐसी महारत हासिल की कि साथी क्रांतिकारी भी उनके निशाने की तारीफ करते थे। कहा जाता है कि उनका निशाना शायद ही कभी चूकता था। किसी भी अभियान से पहले वह हथियारों की नियमित प्रैक्टिस करते और अपने साथियों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे।आज़ाद के लिए हथियार केवल लड़ाई का साधन नहीं थे। वह मानते थे कि क्रांतिकारियों के लिए हथियार आत्मरक्षा, संगठन की सुरक्षा और मिशन की सफलता का माध्यम हैं। इसलिए वह हथियारों के रखरखाव और अभ्यास को बेहद गंभीरता से लेते थे। उनका अनुशासन और आत्मविश्वास ही उन्हें अन्य क्रांतिकारियों से अलग बनाता था।

काकोरी कांड के बाद जब अंग्रेज क्रांतिकारियों के पीछे पड़ गए, तब भी आजाद लंबे समय तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहे। इसका एक बड़ा कारण उनकी फुर्ती, रणनीति और सटीक निशानेबाजी थी। कई मौकों पर उन्होंने अपनी सूझबूझ और निशाने की मदद से साथियों को सुरक्षित निकालने में अहम भूमिका निभाई।27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (अब चंद्रशेखर आजाद पार्क) में अंग्रेजों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। उन्होंने बहादुरी से मुकाबला किया और कई गोलियां चलाकर अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। लेकिन जब उनकी पिस्तौल में आखिरी गोली बची, तो उन्होंने अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार होने के बजाय खुद को गोली मार ली। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा निभाई कि वह कभी भी जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे।

चंद्रशेखर आजाद की निशानेबाजी केवल जन्मजात प्रतिभा का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे बचपन का कठिन अभ्यास, भील समुदाय से मिली सीख, मजबूत इच्छाशक्ति, अनुशासन और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था। यही कारण है कि आज भी उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे साहसी और सटीक निशानेबाज क्रांतिकारियों में लिया जाता है।

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