Knews Desk- बिहार के ग्रामीण इलाकों में पंचायत टैक्स को लेकर एक नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी चल रही है, जिसके तहत हर घर से सालाना औसतन 1200 रुपये वसूले जा सकते हैं। इस प्रस्ताव के लागू होने के बाद पंचायतों को अपनी आय बढ़ाने के लिए होल्डिंग टैक्स और स्थानीय सेवाओं पर शुल्क लगाने का अधिकार मिलेगा। फिलहाल इस योजना को वित्त विभाग की मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे राज्य कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार है।
सरकारी योजना के अनुसार, पंचायतें अब सिर्फ केंद्र और राज्य सरकार के फंड पर निर्भर नहीं रहेंगी, बल्कि अपनी खुद की आमदनी भी जुटा सकेंगी। इसके तहत पानी की आपूर्ति, सफाई व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट और अन्य स्थानीय सुविधाओं के बदले ग्रामीणों से शुल्क लिया जा सकता है। सरकार का अनुमान है कि इस व्यवस्था से पंचायतों को सालाना करीब 2000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है।
आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में करीब 1.68 करोड़ ग्रामीण परिवार रहते हैं। यदि प्रति परिवार औसतन 1200 रुपये सालाना टैक्स लिया जाता है तो कुल संग्रह लगभग 2020 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। राज्य में कुल 8053 ग्राम पंचायतें हैं, जिनमें औसतन हर पंचायत को करीब 25 लाख रुपये सालाना अतिरिक्त आय मिलने का अनुमान है। हालांकि यह राशि पूरी तरह टैक्स वसूली और स्थानीय आबादी पर निर्भर करेगी। इस नई व्यवस्था का संबंध 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों से भी जोड़ा जा रहा है। आयोग ने स्थानीय निकायों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनकी आंतरिक आय बढ़ाने पर जोर दिया है। इसी के तहत बिहार को वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 के बीच लगभग 52 हजार करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है, जबकि चालू वर्ष में करीब 6670 करोड़ रुपये का आवंटन प्रस्तावित है। आयोग की शर्त के अनुसार, राज्य सरकार को कुल फंड का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा अपने संसाधनों से जुटाना होगा।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी घरों पर समान टैक्स नहीं लगाया जाएगा। आवासीय मकानों पर कम दर, जबकि दुकानों, गोदामों और व्यावसायिक संपत्तियों पर अधिक टैक्स लगाने का प्रावधान होगा। बाजार और मुख्य सड़कों पर स्थित संपत्तियों से भी अधिक शुल्क लिया जा सकता है। इसके अलावा, कई सेवाओं के लिए अलग-अलग शुल्क वसूले जाने की योजना है, जिससे ग्रामीण परिवारों का वार्षिक खर्च बढ़ सकता है। हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर विरोध भी शुरू हो गया है। कुछ राजनीतिक और प्रशासनिक स्तरों पर इसे ग्रामीणों पर अतिरिक्त बोझ बताया जा रहा है। बिहार के पंचायती राज मंत्री ने भी इस शर्त पर सवाल उठाए हैं कि सीमित आय वाले ग्रामीण परिवारों पर नया कर लगाना व्यावहारिक नहीं होगा। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधियों ने भी इस मॉडल पर आपत्ति जताई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पंचायतें वसूले गए टैक्स से गांवों में सड़क, सफाई, पेयजल और स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाओं में कितना सुधार ला पाती हैं। यदि लोगों को बेहतर सेवाएं मिलती हैं तो यह मॉडल सफल माना जाएगा, लेकिन सुधार न होने की स्थिति में यह योजना ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकती है।