पाली जिले के आऊवा गांव स्थित महात्मा गांधी अंग्रेजी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में भारी बारिश के दौरान एक कमरे की छत भरभराकर गिर गई. हादसा देर रात हुआ, इसलिए स्कूल बंद होने से बड़ा हादसा टल गया. ग्रामीणों का आरोप है कि स्कूल भवन लंबे समय से जर्जर है और पहले भी छत गिरने की घटना हो चुकी है, लेकिन शिक्षा विभाग ने स्थायी समाधान नहीं किया.
Knews Desk- बारिश का मौसम आते ही ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले मासूम बच्चों की जान पर बन आती है. प्रदेश में पहले भी कई ऐसे दर्दनाक हादसे हो चुके हैं, जहां जर्जर छतों के मलबे के नीचे दबकर मासूम बच्चों ने अपनी जान गंवाई है. उन चीखों और मासूमों की मौत के बाद भी जिम्मेदार महकमा गहरी नींद से जागने को तैयार नहीं है. ऐसा ही एक और खौफनाक मंजर आऊवा गांव के महात्मा गांधी अंग्रेजी सीनियर सैकंडरी स्कूल में देखने को मिला.स्कूल में देर रात भारी बारिश के कारण एक कमरे की छत भरभरा कर ढह गई. यह तो गनीमत थी कि हादसा रात के वक्त हुआ जब स्कूल बंद था, वरना आज कई घरों के चिराग बुझ चुके होते.
झालावाड़ जिले में पिछले साल हुए हादसों के बाद एक बार फिर लगता है कि प्रशासन उसी लापरवाही को दोहराने का काम कर रहा है. घटना की भयानकता को देखते हुए स्कूल के प्रिंसिपल ने तुरंत इसकी सूचना उच्च अधिकारियों को दी. गनीमत यह रही कि रात के समय स्कूल बंद था, वरना जिस वक्त यह छत गिरी, अगर उस समय बच्चे वहां पढ़ रहे होते तो झालावाड़ जैसी ही किसी बड़ी त्रासदी से इनकार नहीं किया जा सकता था.
पहले भी गिर चुकी है छत, शिक्षकों ने खुद कराया था निर्माण
स्थानीय लोगों ने विभाग की पोल खोलते हुए बताया कि आऊवा के इस सरकारी स्कूल में छत गिरने का यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी एक कमरे की छत इसी तरह ढह चुकी है. उस समय भी शिक्षा विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों को अवगत कराया गया था, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. आखिरकार, बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए स्कूल के टीचर्स ने खुद अपनी जेब से राशि एकत्रित की और नई छत का निर्माण करवाया था. विभाग का यह रवैया साफ तौर पर उनकी घोर लापरवाही को दर्शाता है.
जर्जर भवन में बैठने को मजबूर नौनिहाल
वर्तमान में स्कूल के अधिकांश कमरों की स्थिति बेहद नाजुक और डरावनी बनी हुई है. दीवारों और छतों पर बड़ी-बड़ी दरारें साफ देखी जा सकती हैं. मानसून की बारिश के दौरान इन कमरों की छतों से लगातार पानी टपकता है और पूरा बरामदा जलमग्न हो जाता है. ऐसी डरावनी और अव्यवस्थित स्थिति के बीच मासूम स्टूडेंट्स अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं.
पास के प्राथमिक विद्यालय पर भी मंडरा रहा खतरा
ग्रामीणों ने बताया कि केवल यही स्कूल नहीं, बल्कि इसके पास ही स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय का भवन भी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त और खंडहर हो चुका है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस डेंजर जोन घोषित होने लायक भवन में आज भी छोटे-छोटे बच्चे बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं. झालावाड़ के हादसों को देखने के बाद अब आऊवा के ग्रामीणों में प्रशासन के खिलाफ भारी रोष है. ग्रामीणों ने शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन से मांग की है कि कागजी कार्रवाई छोड़कर तत्काल इन भवनों की मरम्मत करवाई जाए, ताकि बच्चों के जीवन को सुरक्षित किया जा सके.