दिल्ली दंगों के आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाओं पर कड़कड़डूमा कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुनवाई के दौरान वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले की व्याख्या और उसे बड़ी बेंच द्वारा फिर से विचार किए जाने की संभावना को लेकर दलीलें पेश कीं। वहीं दिल्ली पुलिस ने कहा कि जब तक बड़ी बेंच से इस पर स्पष्टता नहीं मिलती, तब तक सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा निर्देश ही लागू रहेंगे।
Knews Desk- दिल्ली दंगों के आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया है। दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के बाद निर्णय अपने पास सुरक्षित रखा।
सुनवाई के दौरान शरजील इमाम की ओर से वकील तालिब मुस्तफा ने दलील दी कि क्या किसी आरोपी पर एक साल तक जमानत याचिका दाखिल न करने जैसी रोक लगाई जा सकती है और क्या इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच को विचार नहीं करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में कुछ अन्य आरोपियों को मामला बड़ी बेंच को भेजे जाने का लाभ मिला है।
वहीं दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकील ने कहा कि जब तक बड़ी बेंच से कोई स्पष्टता नहीं आती, तब तक सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा निर्देश, निष्कर्ष और रोक लागू रहेंगे। उन्होंने आगे कहा कि यदि किसी पक्ष को कोई आपत्ति थी तो उसे सुप्रीम कोर्ट में जाकर स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था, क्योंकि उचित मंच वही था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
‘आरोप तय होने से पहले ही 6 साल जेल में बिताए’
शरजील इमाम और उमर खालिद ने अपनी जमानत याचिकाओं में दावा किया है कि बिना आरोप तय हुए ही वे करीब छह साल से हिरासत में हैं। उनका कहना है कि मामले में बड़ी संख्या में आरोपी, गवाह और अभियोजन पक्ष के दस्तावेज होने के कारण मुकदमे की सुनवाई जल्द शुरू होने की संभावना बेहद कम है।
शरजील इमाम ने अपनी अर्जी में यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत देने से इनकार किए जाने के छह महीने बाद भी केस की कार्यवाही में कोई खास प्रगति नहीं हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने यह भी तर्क दिया कि इतने लंबे समय से बिना ट्रायल के हिरासत में रहना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है, जबकि अभी तक मामले में आरोप तय भी नहीं किए गए हैं। यह नई जमानत याचिकाएं तब दाखिल की गईं जब सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को UAPA मामले में शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जबकि सह-आरोपी गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दी गई थी।