KNEWS DESK- इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम इस बार खास महत्व रखता है, क्योंकि इसकी 10वीं तारीख यानी आशूरा कल मनाई जाएगी। यह दिन कर्बला की ऐतिहासिक घटना और इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। इस अवसर पर दुनिया भर में शोक सभाएं, मजलिसें और ताजिया जुलूस निकाले जाते हैं।
क्या है मुहर्रम और क्यों है यह पवित्र?
मुहर्रम इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से एक माना जाता है। इसे इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत भी कहा जाता है। यह महीना विशेष रूप से कर्बला की उस घटना की याद दिलाता है, जिसमें पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ शहादत दी थी।
मुहर्रम के पहले दस दिन गम और शोक के माने जाते हैं, जिनमें लोग इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करते हैं।
आशूरा का क्या है महत्व?
मुहर्रम की 10वीं तारीख को आशूरा कहा जाता है। यह दिन इस महीने का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। भारत समेत कई देशों में यह दिन कल मनाया जाएगा, जबकि सऊदी अरब और यूएई में यह पहले ही मनाया जा चुका है। इस दिन लोग मजलिस, मातम और धार्मिक सभाओं के जरिए कर्बला की घटना को याद करते हैं और श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
ताजिया क्या होता है?
मुहर्रम के दौरान सबसे प्रमुख प्रतीक ताजिया होता है। यह एक प्रतीकात्मक संरचना होती है, जिसे इमाम हुसैन के कर्बला स्थित मकबरे के रूप में बनाया जाता है।
ताजिया को बांस, कागज, लकड़ी और सजावटी सामग्री से तैयार किया जाता है। यह सिर्फ एक ढांचा नहीं बल्कि कर्बला की शहादत और इतिहास की भावनात्मक याद का प्रतीक माना जाता है।
ताजिया क्यों निकाला जाता है?
मुहर्रम में ताजिया निकालने की परंपरा शोक और श्रद्धा से जुड़ी हुई है। ताजिया जुलूस के दौरान लोग इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद करते हुए मातम करते हैं और “या हुसैन” के नारे लगाते हैं।
इस दौरान मजलिसें आयोजित की जाती हैं। नौहा और मातम होता है, कर्बला की घटनाओं का वर्णन किया जाता है। सबील लगाकर लोगों को पानी और सेवा दी जाती है।
ताजिया को पहले घरों, इमामबाड़ों और अजाखानों में रखा जाता है और फिर आशूरा के दिन इसे जुलूस के रूप में निकाला जाता है या निर्धारित स्थान पर दफनाया जाता है।
मुहर्रम की परंपराएं और शोक का माहौल
इस पूरे महीने में धार्मिक माहौल शोकपूर्ण रहता है। महिलाएं और पुरुष अलग-अलग स्थानों पर मजलिसों में शामिल होते हैं और कर्बला की घटनाओं को याद करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा और भाव के साथ निभाई जाती है।
मुहर्रम केवल एक धार्मिक महीना नहीं बल्कि बलिदान, आस्था और इंसानियत की मिसाल है। आशूरा और ताजिया की परंपरा कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाती है, जो न्याय और सत्य के लिए दी गई कुर्बानी का प्रतीक है।