डिजिटल डेस्क- देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाते हुए कहा है कि फुटपाथ पर सुरक्षित चलने का अधिकार संविधान के तहत देश के हर नागरिक का एक मौलिक (मूल) अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शहरी नियोजन और सड़कों के निर्माण में मोटर गाड़ियों की सुगम आवाजाही की तुलना में पैदल चलने वालों की सुरक्षा और उनके इस अधिकार को कहीं अधिक प्राथमिकता और अहमियत दी जानी चाहिए।
आर्टिकल 19 और 21 के तहत दी गई आजादी का हिस्सा
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की खंडपीठ ने इस कानूनी पहलू को स्पष्ट करते हुए कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के आर्टिकल 19(1)(d) के तहत देश के नागरिकों को दी गई बुनियादी आजादी का एक अभिन्न हिस्सा है। यह आर्टिकल भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कहीं भी आने-जाने की आजादी की रक्षा करता है। पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि इसे संविधान के आर्टिकल 19(1)(a), 19(1)(b), 19(1)(c) और आर्टिकल 21 (जीने और व्यक्तिगत आजादी का अधिकार) के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए, क्योंकि बिना सुरक्षित फुटपाथ के सम्मानजनक जीवन और सुरक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।
प्रशासन की होगी कानूनी जिम्मेदारी, लापरवाही पर कसा शिकंजा
सुप्रीम कोर्ट ने देश के स्थानीय निकायों, नगर निगमों और सड़क निर्माण एजेंसियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि अगर कहीं भी कोई सड़क बनाई जा रही है, तो यह सुनिश्चित करना प्रशासन की अनिवार्य जिम्मेदारी है कि पैदल चलने वालों के लिए एक व्यवस्थित फुटपाथ तय किया जाए और उसका उचित रखरखाव भी हो। कोर्ट ने साफ किया कि यह प्रशासन की एक ऐसी कानूनी जिम्मेदारी है, जिसे नागरिक अदालत के जरिए सख्ती से लागू करवा सकते हैं।
5 साल के मासूम की मौत से जुड़ा है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट का यह बड़ा फैसला एक बेहद दुखद सड़क हादसे से जुड़े मुआवजे के मामले की सुनवाई के दौरान आया। दरअसल, एक पिता अपने 5 साल के मासूम बच्चे को स्कूल ले जा रहे थे, तभी एक तेज रफ्तार टैंकर लॉरी ने बच्चे को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी। इस दर्दनाक हादसे में बच्चे की कमर और शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह कुचल गया और गंभीर चोटों के कारण उसकी मौत हो गई। अदालत ने गौर किया कि जिस जगह यह भीषण हादसा हुआ, वहाँ पैदल चलने वालों के लिए न तो कोई फुटपाथ बना था और न ही कोई पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग (जेब्रा क्रॉसिंग) की व्यवस्था थी। इसी लापरवाही को संज्ञान में लेते हुए कोर्ट ने नागरिकों की सुरक्षा के हक में यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी है।