सिर्फ हुक्म न मानने या अनुशासनहीनता पर नहीं जा सकती नौकरी…. सुप्रीम कोर्ट ने दिया नौकरीपेशा के पक्ष में फैसला

डिजिटल डेस्क- सुप्रीम कोर्ट ने देश के नौकरीपेशा लोगों के हक में एक बड़ा और मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पुराने कर्मचारी को सिर्फ अनुशासनहीनता या अधिकारियों का आदेश न मानने (हुक्मउदूली) के आधार पर सीधे नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने 2017 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसके तहत एक कर्मचारी को सेवा से निकाल दिया गया था।

इन गंभीर मामलों में ही दी जा सकती है बर्खास्तगी की सजा

सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि नौकरी से निकालने जैसी सबसे सख्त सजा सिर्फ बेहद गंभीर और दुर्भावनापूर्ण मामलों में ही दी जानी चाहिए। अदालत के अनुसार, यह कड़ी कार्रवाई केवल तभी जायज है जब कर्मचारी पर भ्रष्टाचार, गैर-कानूनी तरीके से पैसे लेने, अनैतिक आचरण, फंड का गलत इस्तेमाल करने, नियोक्ता (एम्प्लॉयर) को जानबूझकर भारी नुकसान पहुंचाने या सार्वजनिक रूप से संगठन की बदनामी करने जैसे गंभीर आरोप साबित हों। अदालत ने कहा कि काम की जगह पर अनुशासन जरूरी है, लेकिन सजा का पैमाना हमेशा गलती की गंभीरता और कर्मचारी के पिछले सर्विस रिकॉर्ड के अनुपात में होना चाहिए।

कर्मचारी ही नहीं, पूरे परिवार पर पड़ता है सीधा असर

सुप्रीम कोर्ट ने सेवा से बर्खास्तगी के गंभीर सामाजिक और आर्थिक परिणामों पर भी विस्तार से चर्चा की। पीठ ने कहा कि जब किसी कर्मचारी को नौकरी से निकाला जाता है, तो मालिक और कर्मचारी का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। इसके साथ ही वह कर्मचारी जीवनभर की जमा-पूंजी यानी रिटायरमेंट के सभी फायदों से भी वंचित हो जाता है। अदालत ने बेहद संवेदनशील टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे कठोर फैसलों का असर सिर्फ उस कर्मचारी पर नहीं पड़ता, बल्कि उसकी मौजूदा कमाई बंद होने से उस पर निर्भर परिवार के सदस्यों और बच्चों का पूरा जीवन प्रभावित होता है।

सर्विस रिकॉर्ड पर हमेशा के लिए लग जाता है बदनामी का दाग

अदालत ने फैसले में इस बात को भी रेखांकित किया कि नौकरी से निकाले जाने पर व्यक्ति के सर्विस रिकॉर्ड पर हमेशा के लिए एक ऐसा दाग लग जाता है, जिसे मिटाना मुमकिन नहीं होता। जस्टिस एन.के. सिंह ने कहा कि इस तरह के फैसलों से कर्मचारी के भविष्य में दोबारा नौकरी मिलने की संभावनाएं पूरी तरह खत्म हो जाती हैं। खासकर सरकारी नौकरियों, वैधानिक निकायों (Statutory Bodies), पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) और अन्य रेगुलेटेड संस्थानों में, जहां पिछला रिकॉर्ड और सर्विस बैकग्राउंड बहुत मायने रखता है, वहां वह व्यक्ति हमेशा के लिए अयोग्य हो जाता है। इसलिए प्रबंधन को ऐसा कोई भी आत्मघाती कदम उठाने से पहले बेहद सतर्क रहना चाहिए।

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