डिजिटल डेस्क- हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर एक हलफनामे में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि ड्यूटी के दौरान शहीद होने वाले अग्निवीर और नियमित सैनिक सेवा लाभों के मामले में एक समान स्तर पर नहीं हैं। सरकार के अनुसार, अग्निवीरों को मरणोपरांत मिलने वाली पेंशन का लाभ नहीं दिया जा सकता। यह बयान उस याचिका के जवाब में आया है जिसमें मांग की गई थी कि शहीद अग्निवीरों के परिवारों को भी वही सम्मान और वित्तीय सुरक्षा मिलनी चाहिए जो एक नियमित सैनिक के परिवार को मिलती है। शहीद मुरली नायक की मां की याचिका यह पूरा मामला शहीद अग्निवीर मुरली नायक की मां, ज्योतिबाई नायक द्वारा दायर याचिका के बाद चर्चा में आया। मुरली नायक पिछले साल 9 मई, 2025 को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान देश के लिए शहीद हो गए थे। उनकी मां का तर्क है कि अग्निवीर भी उन्हीं जोखिमों और कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं जिनमें नियमित सैनिक, इसलिए उनके साथ सेवा लाभों में भेदभाव करना मनमाना और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
अग्निपथ योजना का हलफनामा देकर किया बचाव
एक अल्पकालिक नीतिगत व्यवस्था केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में ‘अग्निपथ योजना’ के मूल ढांचे का बचाव किया है। सरकार का कहना है कि यह एक अल्पकालिक व्यवस्था है जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य गतिशीलता को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। नियमित सैनिकों की नियुक्ति लंबी अवधि की होती है, जिससे पेंशन जैसे लाभ जुड़े होते हैं, जबकि अग्निवीरों की नियुक्ति महज चार साल के निश्चित कार्यकाल के लिए होती है। सरकार के अनुसार, इन दो अलग-अलग श्रेणियों के बीच तुलना करना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है।
2.3 करोड़ का वित्तीय मुआवजा प्रदान किया गया
मुआवजा और सैन्य सम्मान पर सरकार का पक्ष अदालत में केंद्र ने यह भी जानकारी दी कि भले ही पेंशन का प्रावधान नहीं है, लेकिन शहीद मुरली नायक का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ किया गया था। सरकार ने बताया कि उनके परिवार को रेजिमेंट की ओर से शोक-पत्र भेजा गया और कुल 2.3 करोड़ रुपये का वित्तीय मुआवजा प्रदान किया गया। केंद्र ने अदालत से इस याचिका को खारिज करने का अनुरोध करते हुए कहा कि यह एक नीतिगत फैसला है और इसकी न्यायिक समीक्षा सीमित होनी चाहिए। सामाजिक और राजनीतिक बहस इस स्पष्टीकरण के बाद देश में ‘अग्निपथ योजना’ को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। जहां एक तरफ सरकार इसे सैन्य सुधारों के लिए आवश्यक बता रही है, वहीं दूसरी ओर शहीद परिवारों और विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे सैनिकों के प्रति ‘भेदभावपूर्ण’ मान रहा है। अब सबकी नजरें बॉम्बे हाई कोर्ट के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है।