डिजिटल डेस्क- देश की अदालतों में लंबित मामलों के बोझ को कम करने और नागरिकों के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने देश भर के सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) को निर्देश दिया है कि जमानत याचिकाओं का निपटारा अब एक तय समय-सीमा के भीतर किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जमानत जैसे संवेदनशील मामलों को अनावश्यक रूप से टालना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स के लिए सख्त गाइडलाइंस जारी करते हुए कहा है कि नई जमानत याचिकाओं को दाखिल होने के महज एक हफ्ते के भीतर सुनवाई के लिए लिस्ट किया जाना चाहिए। कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि हर जमानत मामला कम से कम 15 दिनों के भीतर एक बार सुनवाई पर जरूर आना चाहिए। यदि किसी कारणवश कोई केस तय तारीख पर सुनवाई के लिए नहीं आता है, तो उसे ‘ऑटोमैटिक’ रूप से अगली तारीख पर दोबारा लिस्ट करने की व्यवस्था बनाई जाए।
सरकार और एजेंसियों की ‘तारीख पर तारीख’ पर रोक
अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि अक्सर केंद्र या राज्य सरकारों और जांच एजेंसियों के अनुरोध पर सुनवाई को बार-बार टाला जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बिना किसी पुख्ता और अनिवार्य वजह के सुनवाई स्थगित नहीं की जाएगी। देरी को रोकने के लिए कोर्ट ने सुझाव दिया है कि याचिकाकर्ता के वकील को अपनी याचिका की एक एडवांस कॉपी पहले ही राज्य के एडवोकेट जनरल या संबंधित एजेंसी को सौंप देनी चाहिए, ताकि ‘दस्तावेज नहीं मिले’ जैसी तकनीकी वजहों से कोर्ट का समय बर्बाद न हो।
NDPS केस और फॉरेंसिक रिपोर्ट का पेंच
ड्रग्स से जुड़े मामलों में होने वाली देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने विशेष चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने पाया कि फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट समय पर न मिलने के कारण जमानत याचिकाएं महीनों तक लटकी रहती हैं। इसके समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट्स के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश दिया है कि वे राज्य सरकारों से बात करें और फॉरेंसिक लैब की कार्यप्रणाली में सुधार सुनिश्चित करें, ताकि रिपोर्ट समय पर कोर्ट पहुंच सके।
आंकड़ों ने बढ़ाई सुप्रीम कोर्ट की चिंता
यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी उच्च न्यायालयों से मांगे गए लंबित याचिकाओं के डेटा के विश्लेषण के बाद आए हैं। प्राप्त आंकड़ों से पता चला है कि हजारों की संख्या में जमानत अर्जियां लंबित हैं, जिससे जेलों में कैदियों की संख्या बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि राज्य सरकार, हाईकोर्ट और जांच एजेंसियों को मिलकर एक ऐसा ‘रोबस्ट सिस्टम’ बनाना होगा जहाँ पीड़ितों के अधिकारों और आरोपी की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहे।
पीड़ित पक्ष की सुनवाई भी अनिवार्य
अदालत ने अपने निर्देशों में मानवीय पक्ष का भी ध्यान रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान केवल आरोपी की दलीलों को ही न सुना जाए, बल्कि मामले से जुड़े पीड़ित पक्ष को भी अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य न्याय प्रक्रिया को तेज करना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया में होने वाली देरी के कारण अनावश्यक रूप से जेल में न रहना पड़े।