Knews Desk– कॉर्पोरेट दुनिया में वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच एक Gen Z कर्मचारी की आपबीती सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। इस पोस्ट ने कंपनियों के कार्यसंस्कृति और कर्मचारियों पर बढ़ते दबाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रेडिट पर साझा की गई इस पोस्ट में एक युवा कर्मचारी ने दावा किया है कि वह अपने नोटिस पीरियड के दौरान भी रात 1 बजे तक काम करने के लिए मजबूर रहा। कर्मचारी के अनुसार, महीने के अंत में क्लोजिंग का भारी दबाव था और उसने कई बार मैनेजमेंट से मदद और बैकअप की मांग की, लेकिन कोई सहायता नहीं मिली। पूरी जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति के कंधों पर डाल दी गई।
कर्मचारी ने अपनी पोस्ट में लिखा कि कंपनी को यह अच्छी तरह पता था कि सारा काम एक व्यक्ति पर निर्भर है, जिसे वह “key person risk” कहती थी। इसके बावजूद किसी प्रकार का अतिरिक्त स्टाफ या सपोर्ट नहीं दिया गया। अंततः सारा काम उसी कर्मचारी को देर रात तक करना पड़ा। पोस्ट में कर्मचारी ने यह भी लिखा कि ऑफिस में कभी भी खुद को अत्यधिक महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए, क्योंकि कर्मचारी के जाने के बाद भी काम चलता रहता है। उसने यह भी कहा कि काम से प्यार किया जा सकता है, लेकिन कंपनी या नौकरी से भावनात्मक लगाव रखना हमेशा सही नहीं होता।
सबसे विवादास्पद हिस्सा तब सामने आया जब कर्मचारी ने ओवरटाइम अलाउंस की मांग की, जिस पर कथित तौर पर मैनेजमेंट ने जवाब दिया कि उन्होंने देर तक काम करने के लिए कभी नहीं कहा था। कर्मचारी ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब डेडलाइन और जिम्मेदारी दी गई थी, तो काम अधूरा कैसे छोड़ा जा सकता था। यह पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स की तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने इसे शोषण करार दिया, जबकि कुछ ने कहा कि यह कॉर्पोरेट कल्चर की कड़वी सच्चाई है। एक यूजर ने लिखा कि उन्होंने अपने शुरुआती करियर में लगातार 20 घंटे तक काम किया, जिसे उन्होंने “मेहनत नहीं बल्कि शोषण” बताया।
वहीं अन्य यूजर्स ने सलाह दी कि कर्मचारियों को अपने काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करनी चाहिए, क्योंकि कंपनियां अक्सर अतिरिक्त मेहनत का स्थायी लाभ नहीं देतीं। यह घटना एक बार फिर कॉर्पोरेट दुनिया में कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य, ओवरवर्क और वर्क-लाइफ बैलेंस जैसे मुद्दों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।