KNEWS DESK – पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी के भीतर मची उथल-पुथल ने बड़ा सियासी मोड़ ले लिया है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी को अपने ही राज्यसभा सांसदों की बगावत से बड़ा झटका लगा है। खास बात ये रही कि जिस नेता को पार्टी का ‘रणनीतिकार’ माना जाता था, वही इस पूरे घटनाक्रम में अहम कड़ी बनकर सामने आया।
अंदरूनी भरोसा और बड़ा झटका
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, AAP नेतृत्व को पहले से अंदेशा था कि कुछ सांसद असंतुष्ट हैं। राघव चड्ढा और स्वाति मालीवाल को लेकर सतर्कता भी बरती जा रही थी। लेकिन जिन नेताओं पर सबसे ज्यादा भरोसा था, उनमें संदीप पाठक का नाम प्रमुख था।
बताया जाता है कि मनीष सिसोदिया और संजय सिंह ने भी नेतृत्व को भरोसा दिलाया था कि कुछ सांसद किसी भी हाल में पार्टी नहीं छोड़ेंगे। इसी भरोसे के चलते पार्टी को लगा कि दलबदल की स्थिति में भी संख्या पूरी नहीं हो पाएगी।
2/3 के खेल में बदली बाज़ी
राज्यसभा में AAP के कुल 10 सांसद थे 7 पंजाब से और 3 दिल्ली से। पार्टी का आकलन था कि दो-तिहाई संख्या (7 सांसद) जुटाना आसान नहीं होगा। लेकिन 24 अप्रैल को हालात अचानक बदल गए, जब सात सांसदों ने एक साथ पाला बदल लिया और भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने का फैसला कर लिया।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब सातवें सांसद के रूप में संदीप पाठक का नाम सामने आया—वही नेता, जिन्हें पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता था।
‘डबल क्रॉस’ के आरोप
सूत्रों का दावा है कि संदीप पाठक लगातार नेतृत्व के संपर्क में रहकर पार्टी की रणनीति की जानकारी लेते रहे और दूसरी तरफ यह जानकारी कथित तौर पर बागी गुट तक पहुंचती रही। यही वजह रही कि आखिरी वक्त तक पार्टी नेतृत्व को वास्तविक स्थिति का अंदाजा नहीं लग सका।
बताया जाता है कि 24 अप्रैल की दोपहर जब केजरीवाल को बगावत की पूरी जानकारी मिली, तब उन्होंने सबसे पहले मनीष सिसोदिया को फोन कर स्थिति साझा की। उस वक्त तक सातवें सांसद की पहचान स्पष्ट हो चुकी थी, जिसने पूरे समीकरण को बदल दिया।
20 दिनों में तैयार हुई ‘स्क्रिप्ट’
सूत्रों के अनुसार, इस राजनीतिक घटनाक्रम की शुरुआत 2 अप्रैल से ही हो गई थी, जब पार्टी के अंदर जिम्मेदारियों में बदलाव हुआ। इसके बाद धीरे-धीरे असंतुष्ट सांसदों को एकजुट करने की कोशिशें तेज हुईं।
बीच में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई और अन्य दबावों की चर्चाएं भी सामने आईं, जिसने इस सियासी समीकरण को और जटिल बना दिया। 22 से 24 अप्रैल के बीच घटनाएं तेजी से बदलीं और अंततः सात सांसदों ने एक साथ पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया।