डिजिटल डेस्क- सुप्रीम कोर्ट ने जाति आधारित जनगणना को रोकने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने न सिर्फ याचिका को अस्वीकार किया, बल्कि उसमें इस्तेमाल की गई भाषा पर भी कड़ी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत याचिकाकर्ता के प्रति स्पष्ट रूप से असंतोष जताते नजर आए। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से तीखे सवाल करते हुए कहा कि याचिका में “बदतमीजी भरी भाषा” का इस्तेमाल किया गया है, जो अदालत की गरिमा के खिलाफ है। उन्होंने पूछा कि आखिर इस तरह की भाषा किसने तैयार की और क्यों इसका उपयोग किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की भाषा स्वीकार्य नहीं है और याचिकाकर्ताओं को अपनी बात मर्यादित और संवैधानिक तरीके से रखनी चाहिए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली ने की सुनवाई
इस मामले की सुनवाई CJI की अध्यक्षता वाली पीठ ने की, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। पीठ ने सर्वसम्मति से याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस प्रकार के मुद्दों पर अदालत में आने से पहले संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए। याचिका में केंद्र सरकार को जाति आधारित जनगणना रोकने का निर्देश देने की मांग की गई थी। साथ ही, इसमें एकल संतान वाले परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देने के लिए नीति बनाने का भी अनुरोध शामिल था। हालांकि, अदालत ने इन मांगों को विचार योग्य नहीं माना और याचिका को खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता को दी सलाह
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि किसी भी मुद्दे को अदालत में लाने से पहले संबंधित विभागों और अधिकारियों को अवगत कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि “यदि अधिकारियों के स्तर पर समाधान नहीं होता, तभी अदालत का रुख करना चाहिए।” उन्होंने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि एक जागरूक नागरिक और कानून की समझ रखने वाले व्यक्ति के रूप में उन्हें पहले प्रशासनिक स्तर पर प्रयास करना चाहिए। गौरतलब है कि इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने 2 फरवरी को एक अन्य जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था, जिसमें 2027 की जनगणना में जाति आधारित आंकड़ों के संग्रह और सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे।