शिव शंकर सविता- गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा की लंबी और दर्दनाक जिंदगी का आखिरकार अंत हो गया। करीब 13 साल तक कोमा में रहने के बाद उन्होंने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में अंतिम सांस ली। उनका जाना सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि एक ऐसे संघर्ष का अंत है, जिसने पूरे परिवार को भीतर तक तोड़ दिया। हरीश पिछले कई वर्षों से बिस्तर पर थे न बोल पाने की हालत में, न चल पाने की स्थिति में, बस सांसों के सहारे जिंदगी खींचते हुए। जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी, तब एक मुश्किल लेकिन जरूरी फैसला सामने था दर्द से मुक्ति।
मां की प्रार्थना, बेटे की आखिरी सांस
अस्पताल के गलियारों में पिछले कई दिनों से एक मां की सिसकियां गूंज रही थीं। हरीश की मां, हाथ में माला लिए, लगातार हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थीं। उनकी आंखों में उम्मीद थी शायद कोई चमत्कार हो जाए, शायद बेटा एक बार आंखें खोल दे। उन्होंने भावुक होकर कहा था, “मेरा बेटा अभी सांस ले रहा है… उसकी धड़कन चल रही है… वो मुझे छोड़कर नहीं जा सकता…” लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कुछ ही समय बाद हरीश की सांसें हमेशा के लिए थम गईं।
एक हफ्ते की खामोश विदाई
इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के तहत हरीश को बीते एक सप्ताह से खाना और पानी देना बंद कर दिया गया था। डॉक्टरों की विशेष टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी। हर गुजरते दिन के साथ परिवार की उम्मीदें कमजोर पड़ती गईं, लेकिन दर्द का अंत करीब आता गया। अस्पताल के उपशामक देखभाल वार्ड में हरीश की हालत लगातार बिगड़ती रही। अंततः वह क्षण आ गया, जब उनकी जीवन यात्रा समाप्त हो गई शांत, लेकिन भीतर तक झकझोर देने वाली।
13 साल पहले बदली थी जिंदगी
यह दर्दनाक कहानी अगस्त 2013 से शुरू होती है। हरीश राणा उस समय चंडीगढ़ में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र थे। रक्षाबंधन के दिन बहन से फोन पर बात करते हुए वह पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। इस हादसे ने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हो गए हैं। उनके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो चुके थे। वह न चल सकते थे, न बोल सकते थे बस एक जिंदा शरीर बनकर रह गए थे।
इंसाफ के लिए लंबी लड़ाई
अपने बेटे की असहनीय पीड़ा को देखते हुए माता-पिता ने इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, लेकिन परिवार ने हार नहीं मानी। आखिरकार 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में हस्तक्षेप करते हुए इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी। यह फैसला जितना कानूनी था, उतना ही भावनात्मक भी।