डिजिटल डेस्क- दिल्ली हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वायत्तता और कानूनी जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि न्यायिक प्रणाली को ऐसे मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जहां दो वयस्क अपनी पूरी समझदारी से लिए गए फैसलों को बाद में बदलवाने की कोशिश करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि जेंडर या धर्म कोई भी हो, हर वयस्क व्यक्ति अपने निर्णयों के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है। यह टिप्पणी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने एक महिला वकील की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने निचली अदालत द्वारा उसके पति को बलात्कार और अन्य गंभीर आरोपों से बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।
क्या है पूरा मामला?
मामला एक हिंदू महिला और एक मुस्लिम पुरुष से जुड़ा है, जो दोनों पेशे से वकील हैं। महिला का आरोप था कि प्रतिवादी ने अपनी वास्तविक पहचान और पहले से शादीशुदा होने की बात छिपाकर उससे विवाह किया। उसने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने शारीरिक संबंध बनाए, उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें लेकर ब्लैकमेल किया और जबरन धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाया। महिला ने अपने पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया था, जिनमें धारा 376(2)(n) (बार-बार बलात्कार), 377, 493, 495 और 506 शामिल थीं।
सेशन कोर्ट का फैसला
15 अप्रैल 2024 को सेशन कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को इन गंभीर धाराओं से बरी कर दिया था। हालांकि अदालत ने उसे IPC की धारा 323/325 (गंभीर चोट पहुंचाने) के तहत मुकदमे का सामना करने योग्य माना था। सेशन कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट महिला ने दिल्ली हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसमें बरी किए जाने के आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद महिला की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जब दो वयस्क अपनी मर्जी से किसी रिश्ते में आते हैं और साथ रहते हैं, तो बाद में उत्पन्न विवादों को आपराधिक मुकदमे में बदलना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी वयस्क को अपने निर्णयों की जिम्मेदारी स्वयं उठानी चाहिए। केवल रिश्ते के टूटने या मतभेद होने के आधार पर गंभीर आपराधिक आरोपों को पुनर्जीवित करना न्यायोचित नहीं है, जब तक कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य न हों।