डिजिटल डेस्क- देश में रमजान का चांद नजर आ गया है, जिसके साथ ही पवित्र महीने की शुरुआत का ऐलान हो गया। चांद दिखाई देने के बाद अब देशभर में 19 फरवरी को पहला रोजा रखा जाएगा। इससे पहले सऊदी अरब में मंगलवार को रमजान का चांद देखा गया था। आमतौर पर भारत और खाड़ी देशों में रमजान की शुरुआत में एक दिन का अंतर रहता है। रोजा इस्लाम की अहम इबादतों में से एक है। इस पवित्र महीने में मुसलमान अल्लाह की इबादत, आत्मसंयम और आध्यात्मिक शुद्धता पर विशेष ध्यान देते हैं। रोजे के दौरान सुबह सूर्योदय से पहले ‘सहरी’ की जाती है। इसके बाद दिनभर यानी सूर्यास्त तक भोजन और पानी से परहेज किया जाता है। सूर्यास्त के समय ‘इफ्तार’ कर रोजा खोला जाता है। रोजा केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन, वाणी और व्यवहार को भी संयमित रखने की साधना है। इस दौरान झूठ बोलने, गुस्सा करने, चुगली करने और गलत आचरण से बचने की विशेष हिदायत दी जाती है।
सहरी और इफ्तार की परंपरा
रोजा शुरू करने से पहले सहरी की जाती है, जिसे रोजे की तैयारी माना जाता है। सहरी में हल्का और पौष्टिक भोजन किया जाता है ताकि दिनभर ऊर्जा बनी रहे। सूर्यास्त के समय खजूर और पानी से रोजा खोलने की परंपरा है, जिसके बाद नमाज अदा की जाती है और परिवार के साथ इफ्तार किया जाता है। रमजान के महीने में पांच वक्त की नमाज के साथ-साथ रात में तरावीह की नमाज का विशेष महत्व होता है। मस्जिदों में विशेष नमाज और कुरान शरीफ की तिलावत की जाती है। इस दौरान धार्मिक माहौल और भी आध्यात्मिक हो जाता है।
आत्मिक और सामाजिक लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रोजा आत्मसंयम और धैर्य सिखाता है। यह गरीबों और जरूरतमंदों के प्रति सहानुभूति बढ़ाता है, क्योंकि रोजेदार भूख-प्यास का अनुभव कर दूसरों की तकलीफ को समझते हैं। मानसिक रूप से भी यह शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। रमजान का महीना इबादत, दान-पुण्य और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। देशभर की मस्जिदों और घरों में इस पवित्र महीने को लेकर खास तैयारी और उत्साह देखने को मिल रहा है।