Knews Desk– 27 जुलाई 2015 को आईआईएम शिलांग में छात्रों को संबोधित करते हुए देश के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का निधन हो गया था। सादगी, विज्ञान और राष्ट्रसेवा के लिए याद किए जाने वाले डॉ. कलाम ने भारत के सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अभियानों में से एक पोखरण-2 परमाणु परीक्षण में अहम भूमिका निभाई थी। इस गुप्त मिशन के दौरान उनकी पहचान छिपाने के लिए उन्हें ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ का कोडनेम दिया गया था।
मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में किए गए परमाणु परीक्षण ने भारत को दुनिया के परमाणु संपन्न देशों की कतार में मजबूती से खड़ा कर दिया। इस अभियान की सबसे बड़ी चुनौती केवल परीक्षण करना नहीं, बल्कि पूरी तैयारी को विदेशी खुफिया एजेंसियों और उपग्रहों की नजरों से बचाना भी था। इसी वजह से वैज्ञानिकों और सेना के अधिकारियों की पहचान गुप्त रखी गई और उन्हें अलग-अलग कोडनेम दिए गए।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम उस समय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के प्रमुख वैज्ञानिकों में शामिल थे। वे भारत के मिसाइल कार्यक्रम के प्रमुख चेहरों में से एक थे और ‘मिसाइल मैन’ के नाम से जाने जाते थे। पोखरण-2 में उनकी जिम्मेदारी केवल तकनीकी सलाह देने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने डीआरडीओ और परमाणु ऊर्जा विभाग के वैज्ञानिकों के बीच समन्वय स्थापित किया, सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी की, उपकरणों की तैनाती सुनिश्चित की और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पोखरण-2 अभियान में डॉ. कलाम के साथ परमाणु ऊर्जा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. आर. चिदंबरम भी प्रमुख भूमिका में थे। जहां परमाणु उपकरणों के डिजाइन और वैज्ञानिक पहलुओं की जिम्मेदारी परमाणु वैज्ञानिकों ने संभाली, वहीं डीआरडीओ ने रक्षा और संचालन से जुड़े कार्यों को अंजाम दिया। भारतीय सेना ने भी परीक्षण स्थल की सुरक्षा और गोपनीयता बनाए रखने में अहम योगदान दिया।
भारत ने इससे पहले 1974 में ‘स्माइलिंग बुद्ध’ नाम से पहला परमाणु परीक्षण किया था। इसके बाद करीब 24 वर्षों तक कोई नया परीक्षण नहीं हुआ। इस दौरान चीन पहले से परमाणु शक्ति बन चुका था और पाकिस्तान भी अपने परमाणु कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ा रहा था। भारत परमाणु अप्रसार संधि (NPT) को भेदभावपूर्ण मानता था और अपनी सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए परमाणु क्षमता का प्रदर्शन करना जरूरी समझता था।
मार्च 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकार ने परमाणु परीक्षण को मंजूरी दी। यह निर्णय बेहद सीमित लोगों तक रखा गया ताकि विदेशी निगरानी से बचा जा सके। तैयारी के दौरान वैज्ञानिक सामान्य कपड़ों में काम करते रहे और कई लोगों को छद्म नाम दिए गए। इसी क्रम में डॉ. कलाम को ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’ के नाम से जाना गया, जबकि कुछ रिपोर्टों में उन्हें ‘कर्नल पृथ्वीराज’ भी बताया गया है।
11 और 13 मई 1998 को कुल पांच सफल परमाणु परीक्षण किए गए। इन परीक्षणों के बाद भारत ने आधिकारिक रूप से खुद को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र घोषित किया। हालांकि इसके बाद अमेरिका समेत कई देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपने फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।
पोखरण-2 किसी एक वैज्ञानिक की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, भारतीय सेना और राजनीतिक नेतृत्व के संयुक्त प्रयास का परिणाम था। फिर भी डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का नेतृत्व, समन्वय क्षमता और मिशन को सफल बनाने में उनका योगदान भारतीय इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। उनकी पुण्यतिथि पर देश