मिडिल ईस्ट में जंग, भारत में महंगाई! क्या डगमगा जाएगी इकोनॉमी?

K News Desktop-ईरान-इजराइल तनाव का असर! महंगा तेल बढ़ा सकता है भारत की महंगाई, GDP पर भी पड़ सकता है दबाव

वेस्ट एशिया में बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत की इकोनॉमी पर भी पड़ने लगा है। जानकारों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में जारी टकराव की वजह से कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रह सकती हैं, जिससे वित्त वर्ष 2027 में भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा है।इकोनॉमिस्ट्स के मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो देश में महंगाई 10 से 20 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकती है। हालांकि फ्यूल रिटेलर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी न करके उपभोक्ताओं को कुछ राहत दे सकते हैं। इसके बावजूद महंगे तेल का असर आर्थिक विकास और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) पर पड़ सकता है।दरअसल 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर किए गए संयुक्त हमलों के बाद तेहरान ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। इसके बाद से मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार बढ़ रहा है। इसी का असर वैश्विक तेल बाजार पर देखने को मिला है, जहां ब्रेंट क्रूड की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर करीब 85 डॉलर तक पहुंच गई। शुक्रवार के कारोबारी सत्र में तो यह 94 डॉलर प्रति बैरल के पार भी चला गया।

HDFC बैंक का अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की औसत कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल रहती है तो वित्त वर्ष 2027 में भारत की महंगाई दर लगभग 4.3 फीसदी रह सकती है। लेकिन अगर कीमतें 75 डॉलर तक पहुंचती हैं तो महंगाई में करीब 0.20 फीसदी का इजाफा हो सकता है। बैंक की प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट साक्षी गुप्ता का कहना है कि अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो महंगाई पर असर 0.50 फीसदी तक भी जा सकता है, खासकर तब जब एक्साइज ड्यूटी में कोई बदलाव न किया जाए।

केयरएज रेटिंग्स की चीफ इकोनॉमिस्ट रजनी सिन्हा के मुताबिक अगर क्रूड ऑयल की कीमतें लगातार 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो वित्त वर्ष 2027 में महंगाई पहले के अनुमान 4.3 फीसदी से लगभग 0.10 फीसदी ज्यादा हो सकती है। नई कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) सीरीज में पेट्रोल और डीजल का वेटेज भी बढ़कर 4.8 फीसदी हो गया है, जिससे ईंधन की कीमतों का असर महंगाई पर ज्यादा पड़ सकता है।DBS बैंक की सीनियर इकोनॉमिस्ट राधिका राव के अनुसार अगर कच्चे तेल की कीमतें केंद्रीय बैंकों के अनुमान से ज्यादा बढ़ती हैं, तो महंगाई में करीब 0.30 फीसदी तक अतिरिक्त बढ़ोतरी का जोखिम बन सकता है।

भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग आधा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। वित्त वर्ष 2026 के पहले दस महीनों में भारत ने करीब 47 फीसदी तेल सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और इराक जैसे मिडिल ईस्ट देशों से खरीदा।हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि खुदरा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तुरंत बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम है, जिससे आम उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है। नोमुरा के मुताबिक महंगाई और जीडीपी ग्रोथ पर इसका असर फिलहाल सीमित यानी करीब 10 बेसिस पॉइंट तक रह सकता है।फिर भी अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो भारत की आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ सकता है। बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस का कहना है कि सप्लाई में रुकावट की स्थिति में देश की आर्थिक वृद्धि दर 20 से 30 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकती है। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक के सेंसिटिविटी एनालिसिस के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में 10 फीसदी बढ़ोतरी से रियल जीडीपी ग्रोथ लगभग 0.15 फीसदी तक घट सकती है।

महंगे तेल का असर भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट पर भी पड़ सकता है। केयरएज रेटिंग्स का अनुमान है कि अगर क्रूड की कीमतें कई महीनों तक 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो वित्त वर्ष 2027 में भारत का CAD जीडीपी के 1.3 से 1.8 फीसदी तक पहुंच सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में मिडिल ईस्ट की स्थिति और तेल की कीमतें भारत की महंगाई, आर्थिक विकास और बाहरी व्यापार संतुलन को तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।

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