K News Desktop- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने को लेकर संसद में बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दलों ने उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस संसद के दोनों सदनों में जमा कर दिया है। इस प्रस्ताव पर करीब 190 विपक्षी सांसदों के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक विपक्ष की ओर से दिए गए नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सात गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें मतदाताओं को उनके मतदान अधिकार से वंचित करने, राजनीतिक दलों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार और चुनावी प्रक्रियाओं को प्रभावित करने जैसे आरोप शामिल हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में कई ऐसे फैसले लिए गए, जिनसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं।
यह प्रस्ताव मुख्य रूप सेऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने तैयार किया है और इसे संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में जमा कराया गया है। विपक्ष चाहता है कि इस प्रस्ताव पर विचार के लिए एक संयुक्त जांच समिति गठित की जाए, जिसमें दोनों सदनों के सांसद शामिल हों और आरोपों की विस्तृत जांच की जाए।
नोटिस में आरोप लगाया गया है कि बिहार में मतदाता सूची से जुड़े ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) की प्रक्रिया को जिस तरह से संभाला गया, उससे बड़ी संख्या में मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हुए। इसके अलावा विपक्ष का आरोप है कि कुछ मामलों में मुख्य चुनाव आयुक्त का व्यवहार राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ अनुचित रहा और उन्होंने संविधान तथा स्थापित नियमों की अनदेखी की।
विपक्षी दलों का यह भी दावा है कि चुनाव आयोग के कुछ फैसलों से सत्तारूढ़ दल Bharatiya Janata Party को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। खासकर मतदाता सूची के ‘विशेष गहन संशोधन’ को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला कदम बताया है।
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद में महाभियोग की प्रक्रिया अपनानी होती है। इसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। इसके बाद प्रस्ताव को सदन में पेश किया जाता है और पारित होने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। यानी सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है।
अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है और सदन में पेश किया जाता है, तो यह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाएगी। अब नजर इस बात पर टिकी है कि संसद में इस नोटिस पर क्या प्रक्रिया आगे बढ़ती है और क्या आरोपों की जांच के लिए कोई समिति गठित की जाती है या नहीं।
वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से इस मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है और आने वाले दिनों में संसद में इस पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है।