KNEWS DESK- साल की शुरुआत में Meta के खिलाफ अमेरिका में एक बड़ा क्लास-एक्शन केस सामने आया, जिसने मैसेजिंग प्राइवेसी को लेकर नई बहस छेड़ दी। इस केस में आरोप लगाया गया कि WhatsApp ने एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का दावा कर यूजर्स को गुमराह किया, जबकि कथित तौर पर प्राइवेट मैसेज तक एक्सेस संभव था। हालांकि कंपनी ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है।
एलन मस्क ने WhatsApp को बताया असुरक्षित
इस विवाद ने तब और तूल पकड़ लिया जब Elon Musk ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर WhatsApp की सुरक्षा पर सवाल उठाए। एक वायरल पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने लिखा कि “WhatsApp पर भरोसा नहीं किया जा सकता।”

इतना ही नहीं, मस्क ने यूजर्स से अपने प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट होने की अपील भी की, जहां वे बेहतर ऑडियो-वीडियो कॉलिंग और प्राइवेसी का दावा करते हैं। यह पहली बार नहीं है जब मस्क ने Meta और उसके प्लेटफॉर्म्स पर निशाना साधा हो।
मार्क जकरबर्ग और मस्क के बीच पुरानी टक्कर फिर चर्चा में
Mark Zuckerberg और मस्क के बीच की पुरानी प्रतिद्वंद्विता भी इस मुद्दे के साथ फिर सुर्खियों में आ गई है। दोनों टेक दिग्गज अक्सर एक-दूसरे के प्लेटफॉर्म और नीतियों पर टिप्पणी करते रहे हैं, जिससे टेक इंडस्ट्री में प्रतिस्पर्धा और भी दिलचस्प हो गई है।
WhatsApp पर लगे क्या आरोप?
क्लास-एक्शन मुकदमे में आरोप है कि WhatsApp कर्मचारियों, कॉन्ट्रैक्टर्स और कुछ थर्ड-पार्टी सिस्टम्स को यूजर्स के मैसेज तक पहुंच की अनुमति देता है। शिकायत के अनुसार, Meta के कुछ इंटरनल टूल्स कथित रूप से एन्क्रिप्शन को बायपास कर मैसेज रिव्यू कर सकते हैं। हालांकि Meta का कहना है कि WhatsApp का एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन मजबूत है और कंपनी यूजर्स की प्राइवेसी को प्राथमिकता देती है।
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पावेल डुरोव ने भी साधा निशाना
इस बहस में Pavel Durov भी शामिल हो गए। उन्होंने WhatsApp के एन्क्रिप्शन मॉडल की आलोचना करते हुए कहा कि यह “कंज्यूमर फ्रॉड” जैसा हो सकता है और आरोप लगाया कि यूजर डेटा थर्ड पार्टी के साथ शेयर किया जाता है। डुरोव ने अपने प्लेटफॉर्म Telegram को ज्यादा सुरक्षित विकल्प बताया, हालांकि उनके इस दावे पर भी सवाल उठते रहे हैं।
Telegram बनाम WhatsApp: असली फर्क क्या है?
जहां WhatsApp डिफॉल्ट रूप से एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन प्रदान करता है, वहीं Telegram का मॉडल अलग है। Telegram की सामान्य चैट्स क्लाउड-बेस्ड होती हैं, यानी मैसेज उसके सर्वर पर स्टोर होते हैं।
सिर्फ “सीक्रेट चैट” फीचर में ही एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन मिलता है। ऐसे में प्राइवेसी के लिहाज से दोनों प्लेटफॉर्म का दृष्टिकोण अलग-अलग है, और यूजर्स को अपनी जरूरत के अनुसार विकल्प चुनना चाहिए।
क्या सच में खतरे में है आपकी प्राइवेसी?
WhatsApp को लेकर उठे ये सवाल फिलहाल आरोपों और जवाबों के बीच उलझे हुए हैं। जहां एक तरफ मस्क और डुरोव जैसे दिग्गज इसे असुरक्षित बता रहे हैं, वहीं Meta अपने सिस्टम को सुरक्षित बताने पर कायम है।
ऐसे में यूजर्स के लिए जरूरी है कि वे किसी भी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते समय उसकी प्राइवेसी पॉलिसी और फीचर्स को समझें, ताकि उनकी डिजिटल सुरक्षा बनी रहे।