भारत का बजट: औपनिवेशिक विरासत से आधुनिक आर्थिक रोडमैप तक का सफर

शिव शंकर सविता- सरकारी बजट किसी भी देश की आर्थिक दिशा और नीतिगत प्राथमिकताओं का सबसे अहम दस्तावेज़ होता है। यह केवल आय–व्यय का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि आने वाले वित्तीय वर्ष के लिए सरकार की सोच, विकास का विज़न और आम जनता के जीवन को प्रभावित करने वाली योजनाओं का खाका होता है। भारत में हर साल वित्त मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला केंद्रीय बजट आज भले ही आधुनिक आर्थिक रणनीति का प्रतीक बन चुका हो, लेकिन इसका इतिहास औपनिवेशिक दौर से जुड़ा हुआ है। भारत के बजट का सफर सत्ता परिवर्तन, स्वतंत्रता, आर्थिक सुधार और प्रशासनिक बदलावों का सजीव दस्तावेज़ है।

भारत का पहला बजट 7 अप्रैल 1860 को हुआ था पेश

भारत का पहला बजट 7 अप्रैल 1860 को पेश किया गया था। इसे स्कॉटलैंड में जन्मे जेम्स विल्सन ने प्रस्तुत किया, जो उस समय ब्रिटिश भारत के वित्त मंत्री थे। विल्सन ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के संस्थापक भी थे। यह बजट 1857 के विद्रोह के बाद बिगड़ी आर्थिक स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से लाया गया था। 1860 के बजट की सबसे ऐतिहासिक बात यह थी कि इसी बजट में भारत में पहली बार आयकर की शुरुआत की गई। आयकर को सरकार के राजस्व का स्थायी और भरोसेमंद स्रोत बनाने की दिशा में यह पहला कदम था। विल्सन ने स्पष्ट किया था कि सालाना 200 रुपये से कम आय वाले व्यक्ति को कर के दायरे में नहीं लाया जाएगा। इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य के अनुसार, विल्सन के भारत आने से पहले ब्रिटिश अधिकारी प्रत्यक्ष कर प्रणाली पर विचार कर रहे थे, लेकिन कोई ठोस ढांचा मौजूद नहीं था। विल्सन ने पुराने लाइसेंस टैक्स प्रस्ताव को खारिज कर आयकर और लाइसेंस टैक्स से जुड़े नए विधेयक पेश किए। दुर्भाग्यवश, भारत का पहला बजट पेश करने वाले विल्सन का उसी वर्ष अगस्त में कोलकाता में निधन हो गया।

स्वतंत्र भारत का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को हुआ था पेश

15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ और कुछ ही महीनों बाद 26 नवंबर 1947 को स्वतंत्र भारत का पहला बजट पेश किया गया। यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी निभाई देश के पहले वित्त मंत्री आर. के. शनमुखन चेट्टी ने। यह बजट ऐसे समय में आया जब देश विभाजन की त्रासदी, दंगों, शरणार्थी संकट और कमजोर अर्थव्यवस्था से जूझ रहा था। इस बजट का मुख्य फोकस राष्ट्र के पुनर्निर्माण, आर्थिक स्थिरता और औद्योगिक विकास की नींव रखने पर था। यह बजट स्वतंत्र भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में पहला औपचारिक कदम माना जाता है।

रेलवे बजट: अलग पहचान से एकीकरण तक

भारतीय बजट इतिहास में रेलवे बजट की भी खास भूमिका रही है। वर्ष 1924 में, एकवर्थ समिति की सिफारिशों के बाद रेलवे बजट को केंद्रीय बजट से अलग कर दिया गया। इसका उद्देश्य रेलवे के विशाल खर्च और आय को अलग से प्रबंधित करना था। करीब 92 वर्षों तक रेलवे बजट अलग से पेश होता रहा। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था अप्रासंगिक होती चली गई। नीति आयोग और विशेषज्ञों की सिफारिशों के बाद 2017 में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए रेलवे बजट को केंद्रीय बजट में विलय कर दिया। इससे बजट प्रक्रिया सरल हुई और संसाधनों के बेहतर उपयोग का रास्ता खुला।

बजट पेश करने की तारीख में बदलाव

औपनिवेशिक दौर से लेकर 2016 तक केंद्रीय बजट फरवरी के अंतिम कार्यदिवस पर पेश किया जाता था। लेकिन 2017 में इस परंपरा को बदलते हुए सरकार ने बजट की तारीख 1 फरवरी कर दी। इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि सरकार को नए वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल) से पहले योजनाओं को लागू करने के लिए अधिक समय मिल सके। पहले बजट पास होने में देर होती थी, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा आती थी। 1 फरवरी को बजट पेश होने से प्रशासनिक प्रक्रियाएं अधिक प्रभावी हो गईं।

बजट पेश करने के समय में बदलाव

एक और दिलचस्प बदलाव बजट पेश करने के समय से जुड़ा है। ब्रिटिश काल में बजट शाम 5 बजे पेश किया जाता था, ताकि ब्रिटेन में बैठे अधिकारी इसे दिन में देख सकें। यह पूरी तरह औपनिवेशिक सुविधा पर आधारित व्यवस्था थी। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस परंपरा को तोड़ते हुए बजट सुबह 11 बजे पेश करना शुरू किया। यह कदम न केवल प्रतीकात्मक था, बल्कि भारत की आर्थिक संप्रभुता को भी दर्शाता था।

आधुनिक दौर का बजट: डिजिटल और समावेशी

आज का भारतीय बजट केवल कागज़ी दस्तावेज़ नहीं रह गया है। डिजिटल बजट, पेपरलेस प्रस्तुति, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप, महिला सशक्तिकरण और ग्रीन इकॉनमी जैसे विषय आधुनिक बजट की पहचान बन चुके हैं। कोविड-19 के बाद के बजटों में स्वास्थ्य, आत्मनिर्भर भारत, MSME और सामाजिक सुरक्षा पर विशेष जोर दिया गया है। बजट अब केवल सरकार का नहीं, बल्कि आम नागरिक की उम्मीदों का प्रतिबिंब बन चुका है।

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