KNEWS DESK- हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ विघ्नहर्ता श्री गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। कहा जाता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर नृत्य करते हैं, इसलिए इस समय की गई पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और कर्ज, रोग व दरिद्रता जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
हालांकि, पूजा के दौरान कुछ भूलें व्रत के पूर्ण फल में बाधा बन सकती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं प्रदोष व्रत पर किन गलतियों से बचना जरूरी है।
प्रदोष व्रत के दिन इन बातों का रखें विशेष ध्यान
शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत की पूजा में नियमों का पालन अनिवार्य है। यदि पूजा में लापरवाही की जाए या वर्जित वस्तुओं का प्रयोग हो, तो भगवान शिव अप्रसन्न हो सकते हैं।
शिवलिंग पर भूलकर भी न चढ़ाएं ये चीजें
- तुलसी दल: शिवलिंग पर तुलसी अर्पित करना वर्जित माना गया है।
- केतकी का फूल: यह फूल भगवान शिव को अर्पित नहीं करना चाहिए।
- हल्दी: हल्दी देवी-पूजन के लिए शुभ है, शिव पूजा में इसका प्रयोग नहीं किया जाता।
- टूटे हुए चावल: अक्षत हमेशा साबुत होने चाहिए।
- तिल: कुछ स्थानों पर तिल चढ़ाने की परंपरा है, लेकिन चंदन या भस्म अर्पित करना अधिक शुभ माना गया है।
वस्त्र और आचरण से जुड़ी गलतियां
- काले वस्त्र न पहनें: पूजा के समय काले कपड़े अशुभ माने जाते हैं। सफेद, पीले या हल्के रंग के वस्त्र पहनना उत्तम होता है।
- तामसिक भोजन से परहेज: व्रत के दौरान मांस, मदिरा के साथ-साथ लहसुन-प्याज का सेवन भी नहीं करना चाहिए।
- क्रोध और विवाद से बचें: व्रत के दिन झगड़ा, अपशब्द या किसी का अपमान करना अशुभ माना गया है। मन, वचन और कर्म की शुद्धता बनाए रखें।
- पूजा का सही समय: प्रदोष काल में ही पूजा करने से व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है। समय चूकने से लाभ कम हो सकता है।
बुध प्रदोष व्रत की पूजा विधि
प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ सफेद वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। घर के ईशान कोण में शिवलिंग या भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
प्रदोष काल में शिवलिंग का गाय के कच्चे दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद बेलपत्र, भांग, धतूरा, साबुत अक्षत, चंदन, पुष्प और फल अर्पित करें।
गणेश जी को दूर्वा और मोदक या लड्डू चढ़ाएं। ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः’ मंत्र का जाप करें। शिव चालीसा या प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें और अंत में कपूर से आरती करें।
व्रत का पारण अगले दिन त्रयोदशी तिथि समाप्त होने के बाद सात्विक भोजन से करें।
प्रदोष व्रत का धार्मिक महत्व
प्रदोष व्रत हर महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। बुधवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत बुध प्रदोष व्रत कहलाता है, जो बुद्धि, व्यापार, करियर और मानसिक शांति के लिए विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और बिगड़े काम बनने लगते हैं।