KNEWS DESK- सनातन धर्म में मकर संक्रांति को अत्यंत पुण्यदायी पर्व माना जाता है। यह त्योहार सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है और प्रकृति, ऋतु परिवर्तन व आध्यात्मिक उन्नति से जुड़ा हुआ है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और सूर्य उपासना की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
इस वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी। खास बात यह है कि लगभग 23 वर्षों बाद मकर संक्रांति के दिन षटतिला एकादशी का संयोग बन रहा है। इसी कारण इस बार मकर संक्रांति के पारंपरिक नियमों में कुछ विशेष सावधानियां बरतनी आवश्यक होंगी।
षटतिला एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित होती है और इस दिन व्रत, तप व संयम का विशेष महत्व होता है। शास्त्रों और विद्वान पंडितों के अनुसार, एकादशी तिथि पर अन्न का सेवन, अन्न को छूना और अन्न का दान तीनों ही वर्जित माने गए हैं।
विशेष रूप से चावल को एकादशी पर निषिद्ध माना गया है। मान्यता है कि एकादशी पर चावल का सेवन करने से व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है।
सामान्यतः मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाना और उसका दान करना शुभ माना जाता है, लेकिन इस वर्ष षटतिला एकादशी होने के कारण खिचड़ी का सेवन और दान दोनों ही नहीं करना चाहिए, क्योंकि खिचड़ी चावल से बनाई जाती है। इतना ही नहीं, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल को छूना भी वर्जित बताया गया है।
हालांकि इस विशेष संयोग में भी दान-पुण्य का महत्व कम नहीं होता, बल्कि सही वस्तुओं के दान से कई गुना पुण्य प्राप्त होता है।
मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी के दिन इन वस्तुओं का दान अत्यंत शुभ माना गया है- तिल और तिल से बनी वस्तुएं, गुड़, तिल के लड्डू, तिल से बने पकवान, वस्त्र, कंबल और गर्म कपड़े। शास्त्रों में तिल को पापनाशक कहा गया है। मान्यता है कि तिल का दान करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।
इस वर्ष मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी का संगम आत्मशुद्धि, संयम और भक्ति का संदेश देता है। यदि इस दिन सही विधि से व्रत, दान और सूर्य उपासना की जाए, तो व्यक्ति को विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।