जया एकादशी 2026: भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए भूलें से भी न करें ये गलतियां, वरना अधूरी रह जाएगी पूजा की कृपा!

KNEWS DESK- माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। वर्ष 2026 में जया एकादशी 29 जनवरी, गुरुवार को श्रद्धा और विधि-विधान के साथ मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 28 जनवरी को शाम 04 बजकर 35 मिनट से शुरू होकर 29 जनवरी को दोपहर 01 बजकर 56 मिनट तक रहेगी।

शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन की गई पूजा और व्रत से पापों का नाश होता है, लेकिन पूजा में की गई कुछ भूलें व्रत के पूर्ण फल में बाधा बन सकती हैं। ऐसे में जया एकादशी पर विशेष सावधानियां रखना बेहद जरूरी है।

जया एकादशी पर पूजा में अन्न का प्रयोग क्यों है वर्जित?

शास्त्रों के अनुसार, जया एकादशी के दिन पूजा या भोग में अन्न का प्रयोग सबसे बड़ी भूल मानी जाती है। चावल, गेहूं या दाल से बने पदार्थ अर्पित करने से व्रत का पुण्य क्षीण हो सकता है। मान्यता है कि एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इस दिन केवल फलाहार या सात्विक भोग ही स्वीकार्य होता है। अन्न को तमोगुणी माना गया है, जो एकादशी की सात्विक ऊर्जा को प्रभावित करता है। इसलिए पूजा में फल, मखाना, दूध या उससे बने पदार्थ ही अर्पित करने चाहिए।

तुलसी दल के बिना अधूरी मानी जाती है विष्णु पूजा

जया एकादशी पर तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और बिना तुलसी के की गई पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। कई बार भक्त अनजाने में केवल पुष्प अर्पित कर देते हैं और तुलसी को भूल जाते हैं, जिसे एक बड़ी धार्मिक भूल माना गया है। मान्यता है कि तुलसी युक्त पूजा से पापों का नाश होता है और मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।

क्रोध और नकारात्मकता से दूरी बनाना क्यों है जरूरी?

जया एकादशी केवल बाहरी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे आंतरिक शुद्धि का भी पर्व माना गया है। इस दिन क्रोध करना, झूठ बोलना, निंदा करना या किसी को कष्ट पहुंचाना गंभीर दोष माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, यदि व्यक्ति व्रत रखकर भी नकारात्मक विचारों में लिप्त रहता है, तो पूजा का प्रभाव कम हो जाता है। इसलिए मन, वाणी और कर्म की शुद्धता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। संयम, मौन और सकारात्मक चिंतन से ही व्रत का पूर्ण फल मिलता है।

जया एकादशी व्रत का पारण सही समय पर करना क्यों है जरूरी?

शास्त्रों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में ही करना चाहिए। समय से पहले या बहुत देर से व्रत तोड़ना धार्मिक भूल माना गया है। पारण प्रातःकाल स्नान और भगवान विष्णु की पूजा के बाद करना श्रेष्ठ होता है। कई लोग एकादशी तिथि में ही भोजन कर लेते हैं या द्वादशी समाप्त होने के बाद पारण करते हैं, जिससे व्रत अधूरा माना जाता है। सही समय पर पारण करने से ही व्रत का संपूर्ण फल और भगवान विष्णु की स्थायी कृपा प्राप्त होती है।

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