Bhalchandra Sankashti Chaturthi​ 2026: कब है भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी व्रत? जानें तिथि, अर्थ, पूजा विधि और महत्व

KNEWS DESK-सनातन धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले विघ्नहर्ता श्री गणेश की पूजा की जाती है, ताकि कार्य बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक संपन्न हो सके। हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित होती है। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है।

इस व्रत को करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। हालांकि इस वर्ष कई लोगों के मन में यह संशय है कि भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत 6 मार्च को रखा जाएगा या 7 मार्च को। आइए जानते हैं इसकी सही तिथि और महत्व।

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी कब है?

पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 6 मार्च, शुक्रवार को शाम 7 बजकर 53 मिनट पर होगी। वहीं इसका समापन 7 मार्च, शनिवार को शाम 7 बजकर 17 मिनट पर होगा।

संकष्टी चतुर्थी के व्रत में यह नियम होता है कि चतुर्थी तिथि चंद्रोदय के समय विद्यमान होनी चाहिए। 6 मार्च को चंद्रोदय का समय रात 9 बजकर 31 मिनट है और उस समय चतुर्थी तिथि रहेगी। इसलिए इस साल भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत 6 मार्च को रखा जाएगा।

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का अर्थ

“भालचंद्र” का अर्थ है जिसके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान हो। भगवान गणेश के इस स्वरूप में उनके मस्तक पर चंद्र देव सुशोभित होते हैं। इसलिए इस चतुर्थी को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है।

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि

इस दिन विधि-विधान से पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा की सामान्य विधि इस प्रकार है:

  1. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. घर के मंदिर या किसी साफ स्थान पर चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।
  3. चौकी पर भगवान गणेश की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  4. गणपति जी के सामने घी का दीपक और धूप जलाएं।
  5. गंगाजल से भगवान गणेश का अभिषेक करें।
  6. गणेश जी को सिंदूर का तिलक लगाएं।
  7. अक्षत, पीले फूल और दूर्वा अर्पित करें, क्योंकि दूर्वा भगवान गणेश को अत्यंत प्रिय है।
  8. मोदक या मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाएं।
  9. पूजा के दौरान “ॐ भालचंद्राय नमः” मंत्र का जप करें।
  10. संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें और अंत में कपूर से आरती करें।

चंद्रोदय के बाद जल में दूध और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है।

भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का महत्व

हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट दूर हो जाते हैं।

इस व्रत के प्रमुख लाभ इस प्रकार माने जाते हैं:

  • जीवन की बाधाएं और परेशानियां दूर होती हैं
  • आर्थिक समस्याओं से राहत मिलती है
  • संतान सुख की प्राप्ति होती है
  • परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है
  • रुके हुए कार्य सफलतापूर्वक पूरे होते हैं

धार्मिक मान्यता के अनुसार जो भक्त सच्ची श्रद्धा से भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखते हैं, उन्हें भगवान गणेश का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में आने वाले संकट धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।