बॉर्डर किनारे प्रथम गांव के सहारे !

उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासत का सेंटर अब राजधानी देहरादून से शिफ्ट होकर सीमांत पर आ गया है। दरअसल, राज्य सरकार ने राजधानी से निकलकर बॉर्डर पर कैबिनेट करने का बड़ा दांव चला है। राज्य सरकार अब सीमांत क्षेत्रों में भी कैबिनेट बैठक करनी प्रारम्भ कर दी है। जिसकी शुरुआत बीते 4 अक्टूबर को मुख्यमंत्री के गृह जनपद चंपावत के बनबसा से हो गई है, और कई प्रस्तावों पर मुहर भी लगाई गई है। सरकार का मानना है कि अब इसी प्रकार अन्य सीमांत क्षेत्रों में भी जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार तक पहुंचेगी। तर्क दिया जा रहा है कि अब सचिवालय की चारदीवारी में नहीं, बल्कि ग्राउंड जीरो पर जाकर फैसले होंगे, जिससे पलायन रुकेगा और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के तहत बॉर्डर के आखिरी गांव तक कनेक्टिविटी, पक्की सड़कें, बिजली और शुद्ध पेयजल पहुंचेगा और बॉर्डर टूरिज्म को नई उड़ान भी मिलेगी। लेकिन दूसरी तरफ हकीकत ये भी है कि सरकार भले ही सीमांत क्षेत्रों तक योजनाएं पहुंचाने का दावा कर रही है, लेकिन राजधानी देहरादून और आसपास के कई विधानसभा क्षेत्रों में आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। उदाहरण के तौर पर देहरादून के बेहद करीब सहसपुर विधानसभा के कई ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में आज भी सड़क नहीं है, और जहां सड़क है वहां विभागीय लापरवाही के चलते लोगों की दुश्वारियां बढ़ रही हैं। जिससे ग्रामीणों में चिंता व आक्रोश दोनो है। इसी मुद्दे ने अब सियासी तूल पकड़ लिया है। विपक्ष सरकार के इस फैसले को चुनावी स्टंट बता रहा है और सवाल उठा रहा है कि जब पूरे कार्यकाल में पहाड़ की समस्याएं हल नहीं हुईं, तो क्या अब सीमांत क्षेत्रों में बैठकों से क्या तस्वीर वाकई बदल जाएगी। ऐसे में क्या कैबिनेट की ये बैठक सिर्फ एक सियासी संदेश है या पहाड़ की तस्वीर बदलने का विजन यह कह पाना मुश्किल हैं। बरहाल, कुछ भी हो लेकिन इस सबके चलते आपसी बयानबाजी चरम पर देखी जा रही हैं।

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार का फोकस अब सीमांत इलाकों पर नजर आ रहा है। राजधानी देहरादून से निकलकर सरकार की कैबिनेट बैठक बॉर्डर तक पहुंच गई है। बीते चार अक्टूबर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह जनपद चंपावत के बनबसा में धामी कैबिनेट की बैठक कर कई प्रस्तावों पर मुहर लगा इसकी शुरुआत कर दी गई है। सरकार का उद्देश्य है कि फैसले अब सचिवालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ग्राउंड जीरो पर जाकर सीमांत क्षेत्रों की जरूरतों को समझते हुए लिए जाएंगे। वही वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के जरिए सीमांत गांवों में सड़क, बिजली, पानी और कनेक्टिविटी मजबूत करने के साथ बॉर्डर टूरिज्म को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। लेकिन इस पहल के साथ सवाल भी उठ रहे हैं। देहरादून से सटे सहसपुर जैसे इलाकों में आज भी कई ग्रामीण सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की समस्याओं से जूझ रहे हैं। वही विपक्ष ने सीमांत क्षेत्रों में कैबिनेट बैठक करने के सरकार के उद्देश्य पर सवाल खड़े किये है और इस निर्णय को चुनावी स्टंट करार दे रही है। जिसपर सत्ता पक्ष भी पलटवार करता दिखाई दे रहा हैं, और राजनीति भी जमकर होती दिख रही हैं।

कुल मिलाकर, तस्वीर साफ है धामी सरकार ने 2027 से पहले सीमांत कार्ड खेल दिया है। 4 अक्टूबर को बनबसा में की गई कैबिनेट बैठक के जरिए सरकार ये बताना चाहती है कि उसकी प्राथमिकता बॉर्डर के आखिरी गांव हैं। वाइब्रेंट विलेज से लेकर बॉर्डर टूरिज्म तक, बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं। लेकिन ग्राउंड पर हकीकत चुनौती बनी हुई है। जब देहरादून से सटे सहसपुर विधानसभा के पहाड़ी गांवों में आज तक पक्की सड़क, पानी और नेटवर्क नहीं पहुंच पाया, तो नेपाल बॉर्डर से लगे गांवों तक विकास की गाड़ी कैसे पहुंचेगी, ये सबसे बड़ा सवाल है। यही वजह है कि विपक्ष इसे विजन नहीं, मिशन 2027 बता रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार के पास जमीन पर दिखाने को कुछ नहीं है, इसलिए कैबिनेट को सियासी इवेंट बनाया जा रहा है। अब देखना होगा कि बनबसा की ये बैठक वाकई पहाड़ से पलायन रोकने का टर्निंग पॉइंट बनती है या सिर्फ फोटो सेशन बनकर रह जाती है। क्योंकि जनता को बैठकें नहीं, धरातल पर काम चाहिए, जिनके सहारे राजनीतिक दलों की नैया पार होती है।

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