उत्तराखंड- उत्तराखंड में लगातार हो रहे जंगली जानवरों के हमलों ने गढ़वाल और कुमाऊं के सभी क्षेत्रों में रह रहे लोगों की नींद उड़ा रखी है, आकड़ों की बात करें तो साल 2000 से लेकर अब तक 1264 लोगों की मौत और 6500 से अधिक लोग घायल जंगली जानवरो के हमलों से हुए है, पहाड़ी क्षेत्रों की बात करे तो गुलदार, भालू, बाघ के लोगो पर हमले तो वही मैदानी क्षेत्रों में हाथी, बंदरों द्वारा फसलों का नुकसान देखा जा रहा है, सही मायने में कहा जाए तो प्रदेश में मानव-वन्य जीव संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है, वन विभाग, शासन-प्रशासन पूरे प्रयास भी करता दिखाई दे रहा है लेकिन अब तक कोई नतीजा रहात वाला सामने निकल कर नहीं आ रहा है, वहीं प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली जानवरो के आतंक के कारण इसका प्रभाव स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई पर भी हो रहा है, आपको बता दें कि जंगली जानवरों के डर से प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों के स्कूलों के खुलने व बंद करने का समय भी बदल दिया गया है और शासन द्वारा कैब गाड़ियों की व्यवस्था की गयी है ताकि किसी भी प्रकार से कोई हानि न हो पाए लेकिन जंगली जानवरो के पाव अब स्कूल तक भी पहुंचने लग गये है, बीते दिनों की बात करें तो प्रदेश के चमोली जिले के पोखरी स्तिथ हाईस्कूल में ही घुस कक्षा का दरवाजा तोड़ भालू द्वारा एक 11 साल के बच्चे को उठा लिया गया व घायल किया गया, गरिमत स्कूल की एक छात्रा के जज्बे और शोर मचाने के कारण भालू ने आरव को झाड़ियों में ही छोड़ दिया, लेकिन बात यही खत्म नही होती बीते मंगलवार को भी इसी प्रकार एक छात्रा के स्कूल जाते समय रास्ते में भालू दिख जाने के कारण जान बचाते हुए भागते भागते गिर जाने से छात्रा जख्मी हालत में स्कूल पहुंची जिसके बाद स्कूल प्रबंधन ने एम्बुलेंस बुला छात्रा को उपचार के लिए भेजा, यह कोई नये मामले नहीं है इससे पहले भी इसी प्रकार से कई लोगों ने अपनी जान गवाई तो कई लोग घायल भी हुए हैं, तमाम प्रकार की जंगली जानवरों के हमलों की घटनाओं के मामलो ने सबकी नींद उड़ा रखी है, वहीं विपक्ष भी लगातार सरकार के सुरक्षा पैमानो पर सवाल खड़ा करता दिखाई दे रहा है।
प्रदेश में निरंतर चल रहे मानव वन्य जीव संघर्ष को देखते हुए मुख्यमंत्री धामी द्वारा केंद्र से मदद मांगी गई है। साथ ही बड़े स्तर पर रणनीति जानवरों के हमलों को रोकने के लिए बनाने की भी बात कही है, मुख्यमंत्री धामी ने इस मुद्दे पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से भी चर्चा कर सहयोग का अनुरोध किया है, मानव-वन्यजीव संघर्ष राज्य के लिए बड़ी चुनौती को हल करने के लिए जगह-जगह रेस्क्यू सेंटर स्थापित कराये जा रहे हैं, इसके साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वह ग्राउंड पर सक्रिय रहकर नियमित गश्त करें और किसी भी कीमत पर लोगों के जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।
आखिर क्यों बढ़ रहे हैं हमले वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार जंगली जानवरों के गांवों की ओर बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं इन कारणों में निम्न प्रमुख हैं-
जंगलों में भोजन की कमी या बदलाव
मानव गतिविधि बढ़ने से उनके प्राकृतिक आवास का सिकुड़ना
कचरे और पशुधन की उपलब्धता
भालू-गुलदार का प्रजनन काल जिससे वे अधिक आक्रामक रहते हैं
मौसम का पैटर्न बदलने से जंगली जानवरों का स्वभाव भी बदला
कोने-कोने तक सड़क पहुंचने और वनों के ऊपर हेलीकॉप्टरों की गड़गड़ाहट भी वन्य जीवों के विचलित होने का कारण
लगातार वन्य जीव मानव संघर्ष में टकराव की स्थिति देखने को मिल रही है। कुल मिलाकर नुकसान दोनों तरफ का हो रहा है अब तो विपक्ष के पास भी ये मुद्दा सरकार को चेताने के लिए काफी है। लगातार प्रदेश भर में सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी जारी है.लेकिन इस समस्या से निपटने का इलाज किसी के पास नहीं। सरकार सहित वन विभाग का पूरा सिस्टम अब तक मानव वन्यजीव संघर्ष पर फेल नजर आ रहा है। सत्ता पक्ष सफाई देता नजर आ रहा है और आम जनता को आए दिन जंगली जानवरो के हमले से लड़ना पड़ रहा है।
अब मानव वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। जो कि चिंता की बात है। वहीं अब पहाड़ों के बाद मैदानी क्षेत्रों में भी लगातार जंगली जानवरों का आतंक देखने को मिल रहा है। सवाल कुल मिला कर अब यही है कि राज्य सरकार ने भी बढ़ते मानव वन्यजीव संघर्ष को लेकर अपने हाथ खड़े कर लिए है। ऐसे में पहाड़ की भूगौलिक परस्थितियो से गुजर रहे ग्रमीण क्या ऐसे ही मानव वन्यजीव संघर्ष करते रहेंगे क्या सरकार मुआबजे को ही इसका समधान मान रही है या सरकारे प्रशानिक तंत्र मुख दर्शक बने रहेंगे। इस का जवाब शायद अभी तक किसी के पास नहीं।