उत्तराखंड डेस्क – वाह नेताजी… आपने तो कमाल कर दिया, विकास की बड़ी-बड़ी बातें, ऊँचे-ऊँचे दावे और जनता से किए गए वो लुभावने वादे… सब के सब हवा हो गए। जनता ने आपको चुनकर दिल्ली भेजा था ताकि आप उनकी बदहाली दूर करें, लेकिन आपने तो विकास के नाम पर उन्हें ठेंगा दिखा दिया है. जेब में करोड़ों रुपये पड़े हैं, लेकिन खर्च करने की फुर्सत नहीं। जनता प्यासी है, सड़कें टूटी हैं, लेकिन हमारे माननीयों का ‘विकास का मीटर’ दिसंबर 2025 के अंत तक भी हिला तक नहीं है। RTI में हुआ है एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा, जिसे सुनकर आप भी कहेंगे— क्या वाकई ऐसे होगा उत्तराखंड का विकास,आपको बता दे,उत्तराखंड के लोकसभा और राज्यसभा के वर्तमान सांसदों की आवंटित सांसद निधि की कुल धनराशि में दिसंबर 2025 तक केवल 18 प्रतिशत धनराशि ही खर्च हुई है. इसमें पूरे हुए कार्य और गतिमान कार्यों पर खर्च धनराशि शामिल है. सांसदों द्वारा प्रस्तावित 232 कार्य अधिकारियों ने स्वीकृत ही नहीं किए हैं. तो वहीं स्वीकृत कार्यों में से 87 कार्य दिसंबर 2025 तक शुरू भी नहीं हो पाए हैं, यह खुलासा सांसद निधि के नोडल विभाग ग्राम्य विकास आयुक्त उत्तराखंड कार्यालय द्वारा RTI एक्टिविस्ट एडवोकेट नदीम उद्दीन को उपलब्ध करायी गयी सूचना से हुआ है.जिसको लेकर विपक्षी दलों को चुनाव आने से पहले एक बार फिर भाजपा सरकार और उनके सांसदों को घेरने का मौका मिल गया है. जिस पर कई सवाल खड़े हो गए है.
विकास की ये तस्वीर डराने वाली है। RTI कार्यकर्ता नदीम उद्दीन द्वारा निकाली गई जानकारी ने शासन की नींद उड़ा दी है। उत्तराखंड के 8 सांसदों को कुल 95.90 करोड़ की सांसद निधि मिली थी, लेकिन साहब खर्च हुए सिर्फ 18 प्रतिशत, यानी विकास की तिजोरी पर ताला लटका है, और चाबी कहीं खो गई है। अब सुनिए इस सुस्ती के असली खेल की कहानी, उत्तराखंड के सांसदों ने 232 काम प्रस्तावित किए, लेकिन मजाल है, कि अधिकारियों ने उन्हें मंजूरी दी हो. 87 काम तो ऐसे हैं जो कागजों पर पास होकर भी जमीन पर शुरू तक नहीं हुए। सबसे ज्यादा निराशा अनिल बलूनी (गढ़वाल सांसद) ने दी है, जिनका विकास खर्च ‘शून्य’ (0%) है। वहीं हरिद्वार से त्रिवेंद्र सिंह रावत और अल्मोड़ा से अजय टम्टा का खर्च 1% भी नहीं पहुंच सका। अगर लाज बची है तो राज्यसभा सांसद नरेश बंसल (47%) और लोकसभा में अजय भट्ट (18%) की बदौलत। बाकी तो बस ‘सांसद’ होने का तमगा लगाकर विकास को फाइलों में कैद किए बैठे हैं।जिस पर विपक्ष ने कई सवाल भाजपा सरकार के सांसदों के कामकाज को लेकर खड़े कर दिए है,अब भाजपा इन सांसदों का बचाव करती नजर आ रही है,
आरटीआई जानकारी के मुताबिक, दिसंबर 2025 तक उत्तराखंड के 5 लोकसभा और 3 राज्यसभा यानी कुल 8 सांसदों को 95.90 करोड़ की सांसद निधि आवंटित हुई है. इसमें 49 करोड़ 5 लोकसभा सांसदों को 2024-25 और 2025-26 के लिए जबकि 46.90 करोड़ रुपए 3 राज्यसभा सांसदों को उनके कार्यकाल के शुरू होने से दिसंबर 2025 तक आवंटित हुई है. उत्तराखंड के सांसदों के वर्तमान कार्यकाल में पूर्ण कार्यों पर कुल 7.08 करोड़ और जारी अधूरे कार्यों पर दिसंबर 2025 तक कुल 10.65 करोड़ रुपए की धनराशि खर्च हुई है, जो कुल आवंटित धनराशि का 18 प्रतिशत है.जिसको लेकर अब कांग्रेस सहित अन्य दलों ने भाजपा सांसदों की निधि खर्च की मंशा पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए है, साथ ही भाजपा सरकार कांग्रेस के समय पर सांसदों के खरचो का हिसाब विपक्ष से मांग रही है.
ये आंकड़े महज नंबर नहीं हैं, ये उत्तराखंड की उस उम्मीद का गला घोंटना है जो जनता ने वोट देते समय पाल रखी थी। अगर 232 काम अधिकारियों की मेज पर अटके हैं, तो सवाल उठता है कि हमारे राज्य के सांसदों का अपने ही सिस्टम पर कितना प्रभाव है? क्या अधिकारी बेलगाम हैं या सांसद खुद विकास को लेकर गंभीर नहीं? जब तक 95 करोड़ का ये फंड फाइलों से निकलकर पहाड़ों की सड़कों और स्कूलों तक नहीं पहुँचेगा, तब तक ‘देवभूमि’ का विकास सिर्फ एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगा। शासन को जवाब देना होगा और सांसदों को अपनी सुस्ती छोड़नी होगी, वरना आने वाले वक्त में जनता अपने वोट की चोट से इन आंकड़ों का हिसाब जरूर चुकता करेगी।