शिव शंकर सविता- उत्तर प्रदेश में शारीरिक शिक्षा के 32,022 अंशकालिक अनुदेशकों की भर्ती का मामला पिछले नौ सालों से अधर में लटका हुआ है। बेसिक शिक्षा परिषद के 45 हजार से अधिक उच्च प्राथमिक और कंपोजिट स्कूलों के लिए शुरू हुई यह भर्ती आज भी पूरी नहीं हो सकी है, जिससे डेढ़ लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों का भविष्य अनिश्चितता में फंसा हुआ है। अब लंबे इंतजार और न्यायिक प्रक्रिया में देरी से नाराज़ अभ्यर्थियों ने अपनी आवाज बुलंद करने का फैसला किया है। यह भर्ती प्रक्रिया 19 सितंबर 2016 को शुरू हुई थी, जिसमें बीपीएड, डीपीएड और सीपीएड डिग्रीधारियों से आवेदन मांगे गए थे। करीब 1.53 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। इन पदों पर 11 महीने के लिए 7 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय तय किया गया था। लेकिन 2017 में सरकार बदलने के बाद 23 मार्च को इस भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई, जिससे विवाद की शुरुआत हुई।
2017 के बाद से अबतक विचाराधीन है भर्ती
अभ्यर्थियों ने इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नवंबर 2017 में दो महीने के भीतर भर्ती पूरी करने का आदेश दिया, जिसे अप्रैल 2018 में भी बरकरार रखा गया। बावजूद इसके मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर सीधी टिप्पणी करने से इनकार करते हुए इसे फिर से हाईकोर्ट में भेज दिया। तब से यह मामला एक बार फिर विचाराधीन है और अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं आ पाया है। लंबे समय से चल रही इस कानूनी लड़ाई ने अभ्यर्थियों को मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया है। कई अभ्यर्थियों की उम्र सीमा भी पार हो चुकी है, जबकि कुछ ने अन्य अवसरों की उम्मीद में अपने करियर के महत्वपूर्ण साल गंवा दिए। ऐसे में अब छात्रों ने आंदोलन की राह पकड़ने का निर्णय लिया है। गोरखपुर से देवेंद्र पांडे के नेतृत्व में अभ्यर्थी आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं, वहीं प्रयागराज में धीरेंद्र यादव के नेतृत्व में छात्रों का एक बड़ा समूह लामबंद हो रहा है।
छात्रों की ये हैं प्रमुख मांगें
- भर्ती प्रक्रिया को तुरंत दोबारा शुरू (Re-open) किया जाए।
- इसे नियमित (Regularize) करते हुए जल्द से जल्द पूरा किया जाए।
- अदालतों के आदेशों का सम्मान करते हुए नियुक्ति प्रक्रिया को लागू किया जाए।
सरकारें बदलती रहीं पर समस्या जस की तस
बीपीएड बेरोजगार संघ के प्रदेश अध्यक्ष धीरेंद्र यादव का कहना है कि शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत शारीरिक शिक्षा अनिवार्य है, लेकिन स्कूलों में इसके लिए शिक्षकों की भारी कमी है। ऐसे में सरकार को न केवल कोर्ट के आदेशों का पालन करना चाहिए, बल्कि बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द नियुक्तियां करनी चाहिए। अभ्यर्थियों का यह भी कहना है कि सरकारें बदलती रहीं, लेकिन उनकी समस्या जस की तस बनी रही। अब यह सिर्फ एक भर्ती का मुद्दा नहीं, बल्कि युवाओं के अधिकार और सम्मान की लड़ाई बन चुका है।