शिव शंकर सविता- दिल्ली के एम्स के एक शांत कमरे में मंगलवार को ऐसा दृश्य था, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं। वहां कोई शोर नहीं था, कोई हंगामा नहीं… बस एक मां की टूटती आवाज थी, जो अपने बेटे को आखिरी बार “अलविदा” कह रही थी। हरीश राणा… एक नाम, जो पिछले 13 सालों से सिर्फ सांसों के सहारे जी रहा था। एक शरीर, जिसमें जान तो थी, लेकिन जिंदगी कहीं खो चुकी थी। 19 साल की उम्र में शुरू हुआ यह संघर्ष आखिरकार मंगलवार को खत्म हो गया, जब माता-पिता ने कलेजे पर पत्थर रखकर अपने बेटे को हमेशा के लिए विदा कर दिया।
आखिरी पल… जब मां ने खुद को तोड़ दिया
हरीश के बिस्तर के पास मां निर्मला देवी बैठी थीं। उन्होंने बेटे का हाथ थामा, माथे को चूमा और फूट-फूटकर रोते हुए धीरे से कहा, “बेटा… अब जा… शांति से जा…” यह शब्द सिर्फ अलविदा नहीं थे, बल्कि 13 साल के दर्द, उम्मीद और टूटन का आखिरी अध्याय थे। पिता अशोक राणा पास ही खड़े थे। आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर मजबूती… शायद इसलिए ताकि वह अपनी पत्नी को इस असहनीय दर्द में सहारा दे सकें। परिवार ने बस एक ही गुजारिश की “हमें कुछ पल अकेला छोड़ दीजिए… ताकि हम अपने बेटे को सही मायनों में विदा कह सकें।”
एक हादसा… जिसने जिंदगी बदल दी
साल 2013… रक्षाबंधन का दिन… और एक फोन कॉल। हरीश, जो चंडीगढ़ में सिविल इंजीनियरिंग का छात्र था, अपनी बहन से बात कर रहा था। तभी अचानक पीजी की चौथी मंजिल से गिर गया। उसे तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। बाद में हालत बिगड़ने पर दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल लाया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह “क्वाड्रिप्लेजिया” का शिकार हो चुका है—एक ऐसी स्थिति, जिसमें शरीर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाता है। धीरे-धीरे हरीश “परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट” में चला गया… वह देख नहीं सकता था, बोल नहीं सकता था, हिल नहीं सकता था… बस मशीनों के सहारे सांस ले रहा था।
13 साल… हर दिन एक जंग
इन 13 सालों में हर सुबह उसके पिता को उम्मीद होती थी, “शायद आज मेरा बेटा उठ जाएगा…” हर रात मां भगवान से यही दुआ करती थी—“मेरे बच्चे को ठीक कर दो…” लेकिन हर दिन एक नई निराशा लेकर आता था। हर त्योहार, हर खुशी, हर पल अधूरा था… क्योंकि घर में हरीश था, लेकिन उसकी हंसी नहीं थी।
जब प्यार ने सबसे कठिन फैसला लिया
आखिरकार माता-पिता ने एक ऐसा फैसला लिया, जो किसी भी मां-बाप के लिए सबसे बड़ा त्याग होता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने बेटे के लिए “इच्छामृत्यु” की अनुमति मांगी। यह फैसला हार नहीं था… बल्कि बेटे के दर्द को खत्म करने की एक कोशिश थी। कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद, एम्स में वह अंतिम पल आया… जब मां ने अपने ही दिल के टुकड़े को जाने की इजाजत दी।
एक मां की आखिरी फुसफुसाहट
हरीश के जाने के बाद भी मां उसके पास बैठी रहीं। उन्होंने उसके कान में धीरे से कहा, “बेटा… सबको माफ कर दो… और हमें भी माफ कर देना…” यह शब्द सुनकर वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। हरीश अब इस दुनिया में नहीं है… लेकिन उसके संघर्ष की कहानी हर उस इंसान को रुला देती है, जो इसे सुनता है। सोसायटी में सन्नाटा है। लोग कह रहे हैं—“हरीश चला गया, लेकिन वह हमें सिखा गया कि प्यार क्या होता है… और त्याग कितना बड़ा होता है।” डॉक्टरों की सलाह पर उसका अंतिम संस्कार दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित शवदाह गृह में किया जाएगा। गाजियाबाद से भी लोग बड़ी संख्या में अंतिम विदाई देने पहुंचेंगे।