डिजिटल डेस्क- धार्मिक नगरी वाराणसी के प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर मनाई जाने वाली ‘मसान की होली’ इस वर्ष विवादों के घेरे में आ गई है। डोम राजा परिवार के वंशज विश्वनाथ चौधरी ने जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर इस आयोजन पर रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि चिता की राख से होली खेलने की परंपरा शास्त्रसम्मत नहीं है और इससे महाश्मशान की गरिमा प्रभावित हो रही है। मणिकर्णिका घाट को काशी का महाश्मशान कहा जाता है, जहां 24 घंटे दाह संस्कार होते हैं। दशकों से यहां रंगभरी एकादशी के बाद ‘मसान की होली’ मनाने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि भगवान शिव विवाह के बाद माता पार्वती को काशी लाए थे। उस समय उनके गणों ने भी उत्सव की इच्छा जताई, जिसके बाद श्मशान में होली खेलने की परंपरा शुरू हुई। समय के साथ यह आयोजन अघोरी और तांत्रिक परंपराओं से भी जुड़ गया और अब यह देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन चुका है।
पुराणों में मसान की होली का स्पष्ट उल्लेख नहीं
हालांकि, डोम राजा परिवार और काशी विद्वत परिषद से जुड़े कुछ विद्वानों का तर्क है कि किसी भी प्रमुख पुराण या शास्त्र में ‘मसान की होली’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। उनका आरोप है कि हाल के वर्षों में इस आयोजन का स्वरूप बदल गया है और इसमें बाहरी लोगों की भीड़, हुड़दंग तथा अनुशासनहीनता बढ़ी है। इससे श्मशान की पवित्रता और मर्यादा भंग होती है। विश्वनाथ चौधरी ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि इस आयोजन पर रोक नहीं लगाई गई तो डोम समाज दाह संस्कार कार्य रोकने पर विचार कर सकता है। उनका कहना है कि मणिकर्णिका घाट केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि अंतिम संस्कार की गंभीर और संवेदनशील प्रक्रिया से जुड़ा स्थान है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का उत्सव सावधानी और मर्यादा के साथ होना चाहिए।
दूसरे पक्ष ने रखा अपना मत
दूसरी ओर, आयोजन से जुड़े लोगों का कहना है कि काशी स्वयं महाश्मशान है, जहां मृत्यु को भी मोक्ष और उत्सव की दृष्टि से देखा जाता है। उनके अनुसार ‘मसान की होली’ जीवन और मृत्यु के दार्शनिक संतुलन का प्रतीक है। उनका दावा है कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और इसे अचानक रोकना सांस्कृतिक विरासत पर आघात होगा। विवाद को देखते हुए जिला प्रशासन सतर्क हो गया है। अधिकारियों का कहना है कि दोनों पक्षों से वार्ता की जा रही है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। प्रशासन इस बात पर विचार कर रहा है कि यदि आयोजन होता है तो उसे नियंत्रित और मर्यादित रूप में संपन्न कराया जाए, ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था या धार्मिक भावना आहत न हो।