ऊंट और घोड़ों संग झूमा ऐतिहासिक गंगा मेला, होरियारों की मस्ती ने शहर को सराबोर किया

KNEWS DESK- स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े गंगा मेला का आयोजन मंगलवार को कानपुर में उत्साह और उल्लास के साथ हुआ। इस अवसर पर हटिया से सरसैया घाट तक रंगों और परंपराओं का भव्य जुलूस निकला। ऊंट, घोड़े, ट्रैक्टर और ट्रॉली पर सवार होरियारों ने गुलाल और अबीर से शहर की गलियों को सतरंगी बना दिया।

सुबह से ही शहर में कनपुरिया होली की मस्ती चरम पर थी। घरों, आंगनों और छतों से लोग एक-दूसरे के चेहरे रंगने में जुटे थे। बच्चों की रंगभरी शरारतों में बड़े भी शामिल हुए। भाई-बहन, भाभी-देवर, पड़ोसी और परिवार के सदस्य मिलकर एक-दूसरे पर रंग बरसा रहे थे।

बिरहाना रोड पर मटकी फोड़ प्रतियोगिता में ऊंची अटारियों से रंग बरसता रहा। गीतों और नृत्य की धुन पर लोग घंटों थिरकते रहे। सड़कों पर निकलने वाली होरियारों की टोली और छतों से बरसते रंगों ने पूरे शहर को त्योहार और उत्सव की भावना से भर दिया।

गंगा मेला पर हटिया के रज्जन बाबू पार्क को तिरंगे गुब्बारे और केसरिया झंडों से सजाया गया। यहाँ सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह ने तिरंगा फहराया और पुलिस बैंड ने राष्ट्रीय गान की धुन बजाई। विधायक अमिताभ बाजपेई और एमएलसी सलिल विश्नोई के साथ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोगों के परिजन भी मौजूद थे।

जुलूस में सबसे आगे समिति का बैनर था। इसके पीछे आठ ऊंट, छह घोड़े, आठ लोडर और चार ट्रैक्टर ट्रॉली पर सवार नवयुवक रंगों की बौछार कर रहे थे। प्राचीन परंपरा के अनुसार इस बार भैंसा ठेला नहीं था, लेकिन युवकों ने ट्रैक्टर ट्रॉली पर रखे रंगों के ड्रम से उसका विकल्प बनाया।

रज्जन बाबू पार्क से रंगों का ठेला जनरलगंज बाजार, मनीराम बगिया, मूलगंज, टोपी बाजार, चौक कोतवालेश्वर मंदिर और अन्य मार्गों से होते हुए वापस पार्क में समाप्त हुआ। युवाओं ने पिचकारी से रंगों की धार फैलायी, महिलाओं और बच्चों ने ऊपर से रंग बरसाए, जिससे आसमान सतरंगी हो गया। बीच-बीच में “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम” के उद्घोष से जुलूस और भी उत्साहपूर्ण बन गया।

मूलचंद्र सेठ, हटिया गंगा मेला महोत्सव कमेटी के संरक्षक ने बताया कि 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान रज्जनबाबू पार्क में तिरंगा फहराकर यहां रंग खेला गया था। अंग्रेज पुलिस ने उस समय 40 युवकों को गिरफ्तार कर लिया था। व्यापारियों और मजदूरों के विरोध के बाद अंग्रेज अधिकारियों को झुकना पड़ा। इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में आज भी गंगा मेला पर रंगों का उत्सव मनाया जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *