दिल्ली दंगा मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम समेत सात आरोपियों की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट 5 जनवरी को सुनाएगा फैसला

डिजिटल डेस्क- दिल्ली दंगा मामले में आरोपी छात्र नेताओं उमर खालिद, शरजील ईमाम, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा उर रहमान और अन्य तीन आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 5 जनवरी को बड़ा फैसला सुनाने जा रहा है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की पीठ ने दोनों पक्षों को 18 दिसंबर तक अपनी दलीलों का समर्थन करने वाले दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया था। इससे पहले 2 दिसंबर, 2025 को हुई सुनवाई में पीठ ने आरोपियों और प्रॉसिक्यूशन पक्ष की बहसें सुनी थीं।

बचाव पक्ष ने दिया जोर, 5 साल से जेल में है दोनों

बचाव पक्ष ने जोर देकर कहा कि छात्र नेताओं को ट्रायल में हुई देरी के कारण जमानत मिलनी चाहिए। उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी लगभग पांच साल जेल में रह चुके हैं और उनकी अधिकतर सजा पूरी हो चुकी है। इसके अलावा, चार्जशीट की लंबी समीक्षा के बाद यह भी सामने आया कि 2698 पेज की चार्जशीट में कहीं भी यह नहीं लिखा गया कि किसी आरोपी ने सरकार बदलने का प्रयास किया या किसी तरह से देश की संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। इस आधार पर बचाव पक्ष का तर्क था कि प्रॉसिक्यूशन का मकसद केवल आरोपी को जेल में रखना है, न कि न्याय की प्रक्रिया को पूरा करना।इस मामले में छात्र नेताओं को भारतीय दंड संहिता और कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जेल में रखा गया है। मामले की संवेदनशीलता और हाई प्रोफाइल होने के कारण सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को पूरा देश लगातार देख रहा है।

फैसले के निकलेंगे कई मायने

सुप्रीम कोर्ट की अंतिम सुनवाई में पीठ ने दलीलें सुनने के बाद कहा था कि वह सभी पक्षों की प्रस्तुतियां और चार्जशीट का गहन विश्लेषण करने के बाद ही कोई फैसला करेगी। कोर्ट के फैसले का असर न केवल सीधे आरोपी छात्र नेताओं पर पड़ेगा, बल्कि यह भविष्य में जमानत और ट्रायल में देरी से संबंधित मामलों में भी मिसाल बन सकता है। विशेष रूप से यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आरोपी छात्र नेताओं ने लगातार यह दावा किया है कि उनके खिलाफ आरोप राजनीतिक रूप से लगाए गए हैं और उनका उद्देश्य किसी भी तरह से कानून या व्यवस्था को नुकसान पहुंचाना नहीं था। वहीं, प्रॉसिक्यूशन का तर्क रहा कि सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ये कार्रवाई आवश्यक थी।

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