KNEWS DESK- दुनिया के हथियार बाजार में सऊदी अरब एक बार फिर चर्चा में है। इसकी वजह पाकिस्तान के साथ संभावित एक बड़ी सैन्य डील है, जिसके तहत सऊदी अरब, पाकिस्तान से JF-17 थंडर फाइटर जेट खरीदने की तैयारी कर रहा है। यह सौदा इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि इसमें सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान को दिए गए करीब 2 अरब डॉलर के कर्ज को हथियारों की खरीद में तब्दील करने की योजना है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बातचीत चल रही है कि 2 अरब डॉलर के लोन को JF-17 फाइटर जेट सौदे में बदला जाए। JF-17 एक हल्का लड़ाकू विमान है, जिसे पाकिस्तान और चीन ने मिलकर विकसित किया है और इसका निर्माण पाकिस्तान में होता है।
सूत्रों के मुताबिक, यह डील करीब 4 अरब डॉलर की हो सकती है, जबकि अतिरिक्त 2 अरब डॉलर अन्य सैन्य उपकरणों पर खर्च किए जा सकते हैं। यानी कुल पैकेज लगभग 6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक म्यूचुअल डिफेंस पैक्ट साइन हुआ था। इसके तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। यह समझौता ऐसे समय हुआ, जब खाड़ी क्षेत्र पहले से ही तनाव के दौर से गुजर रहा था। परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान सऊदी अरब के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है, और अब यह साझेदारी कूटनीति से आगे बढ़कर हथियार सौदों तक पहुंचती दिख रही है।
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के मुताबिक, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में शामिल हैं। 2020 से 2024 के बीच वैश्विक हथियार आयात में GCC देशों की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत रही।
हालांकि इस दौरान सऊदी अरब के हथियार आयात में लगभग 41 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, फिर भी वह मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा हथियार आयातक बना रहा और दुनिया में चौथे स्थान पर रहा। यूक्रेन, भारत और कतर के बाद सऊदी अरब अब भी वैश्विक हथियार बाजार की बड़ी ताकत है।
सऊदी अरब के हथियार आयात में अमेरिका की भूमिका सबसे अहम बनी हुई है। 2020 से 2024 के बीच सऊदी अरब द्वारा खरीदे गए करीब 74 प्रतिशत हथियार अमेरिका से आए। इसके बाद स्पेन से लगभग 10 प्रतिशत और फ्रांस से 6 प्रतिशत से अधिक हथियार खरीदे गए। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के कुल हथियार निर्यात का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा अकेले सऊदी अरब को गया, जिससे दोनों देशों के सैन्य रिश्तों की गहराई साफ झलकती है।
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में सऊदी अरब को F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट बेचने की मंजूरी को बड़ा रणनीतिक फैसला माना गया। यह वही प्रोग्राम था, जिससे सऊदी अरब को लंबे समय तक दूर रखा गया था। इस कदम से यह साफ हो गया कि अमेरिका सऊदी अरब को अब भी अपना प्रमुख सैन्य ग्राहक मानता है, लेकिन साथ ही सऊदी अरब वैकल्पिक साझेदार भी तैयार कर रहा है।
आखिर सऊदी अरब इतनी हथियार खरीद क्यों रहा है?
- मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ता क्षेत्रीय तनाव सऊदी अरब को सतर्क कर रहा है। यमन में सऊदी अरब और यूएई के बीच पैदा हुआ तनाव इसका ताजा उदाहरण है।
- सऊदी नेतृत्व को यह आशंका भी है कि अमेरिका कभी भी अपनी प्राथमिकताएं बदल सकता है, इसलिए वह पाकिस्तान, चीन और यूरोपीय देशों जैसे विकल्पों को साथ लेकर चलना चाहता है।
- Vision 2030 के तहत सऊदी अरब घरेलू रक्षा उद्योग खड़ा करने की कोशिश कर रहा है, हालांकि फिलहाल हथियार आयात पर उसकी निर्भरता बनी हुई है।
- कुल मिलाकर हथियार सऊदी अरब के लिए सिर्फ सुरक्षा का जरिया नहीं, बल्कि यह मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत का स्पष्ट संदेश भी है।