35 साल बाद बदली बांग्लादेश की सत्ता की तस्वीर, कभी सत्ता नहीं चला पाया पुरुष

KNEWS DESK- बांग्लादेश की राजनीति ने दो दशक बाद बड़ा यू-टर्न लिया है। आम चुनाव में Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने 299 में से 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। 286 सीटों के घोषित नतीजों के साथ ही 150 के जादुई आंकड़े को पार्टी काफी पीछे छोड़ चुकी है। साफ है कि अब सत्ता की चाबी BNP के हाथ में है।

इस जीत के साथ ही पार्टी अध्यक्ष तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। दो सीटों से चुनाव लड़ने वाले तारिक ने दोनों जगह जीत दर्ज की है। 17 साल बाद देश वापसी करने वाले तारिक अब बांग्लादेश की सत्ता के सबसे बड़े दावेदार बनकर उभरे हैं।

तारिक रहमान की संभावित ताजपोशी सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीतिक परंपरा में बड़ा बदलाव है। 1991 से 2024 तक देश की राजनीति दो महिला नेताओं—शेख हसीना और खालिदा जिया—के इर्द-गिर्द घूमती रही। दोनों ने बारी-बारी से सत्ता संभाली और दशकों तक राजनीतिक परिदृश्य पर मजबूत पकड़ बनाए रखी।

1988 में काजी जफर अहमद के बाद अब 35 साल बाद कोई पुरुष नेता प्रधानमंत्री पद की कमान संभालने जा रहा है। इससे पहले लंबे समय तक महिला नेतृत्व ही बांग्लादेश की पहचान बन चुका था।

2008 से 2024 तक Awami League लगातार सत्ता में रही। लेकिन इस बार हालात बदले हुए थे। शेख हसीना देश छोड़ चुकी हैं और उनकी पार्टी को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली। चुनाव आयोग ने 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा को आधार बनाते हुए यह फैसला लिया।

वहीं, खालिदा जिया के निधन के बाद BNP पहली बार उनके बिना चुनावी मैदान में उतरी और भारी जनादेश के साथ सत्ता की ओर बढ़ गई।

16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से अलग होकर बने बांग्लादेश की पहली कमान शेख मुजीबुर रहमान ने संभाली। 1975 में उनकी हत्या के बाद देश में तख्तापलट और राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हुआ।

इसके बाद ताजुद्दीन अहमद, मुहम्मद मंसूर अली, शाह अज़ीजुर रहमान और मिज़ानुर रहमान चौधरी जैसे नेताओं ने प्रधानमंत्री पद संभाला, लेकिन स्थिर शासन नहीं दे सके। 1991 में संसदीय लोकतंत्र की बहाली के बाद राजनीति दो महिला नेताओं के बीच सिमट गई और वही दौर तीन दशक से अधिक समय तक चलता रहा।

तारिक रहमान को भारी जनादेश मिला है, लेकिन उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। अवामी लीग को चुनाव से बाहर रखने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि पूरी तरह शांत नहीं हुई है। महंगाई, बेरोजगारी और निवेश की सुस्ती आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चुनौतियां हैं। कट्टरपंथी ताकतों और विपक्षी समूहों की सक्रियता भी चिंता का विषय है।

जनता बदलाव चाहती है, लेकिन स्थिरता भी उतनी ही अहम है। ऐसे में तारिक रहमान के लिए यह जीत अवसर भी है और परीक्षा भी। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि बांग्लादेश की नई सरकार राजनीतिक संस्कृति में बदलाव के साथ स्थिर शासन दे पाती है या नहीं।

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