KNEWS DESK- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर “अमेरिका फर्स्ट” नीति को प्राथमिकता देते हुए बड़ा फैसला लिया है। ट्रंप प्रशासन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस की पहल से शुरू हुई इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) सहित कुल 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से खुद को अलग करने का ऐलान किया है। इस कदम को वैश्विक सहयोग और जलवायु प्रयासों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संकट और ऊर्जा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे में अमेरिका जैसे बड़े और प्रभावशाली देश का इन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर निकलना कई सवाल खड़े कर रहा है।
इंटरनेशनल सोलर अलायंस की शुरुआत साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने मिलकर की थी। इसका उद्देश्य दुनिया भर में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और खासकर विकासशील देशों को सस्ती, स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा उपलब्ध कराना है। वर्तमान में इस संगठन से 120 से अधिक देश जुड़े हुए हैं। अमेरिका भी अब तक इसका सदस्य था, लेकिन ट्रंप सरकार ने इससे बाहर निकलने का फैसला कर लिया है।
व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक प्रेसिडेंशियल मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत अमेरिका 66 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से हटेगा। इनमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र (Non-UN) संस्थाएं और 31 संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एजेंसियां शामिल हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि प्रशासन की समीक्षा में पाया गया कि ये संस्थाएं अत्यधिक खर्चीली हैं, ठीक से संचालित नहीं हो रहीं और कई मामलों में अमेरिका की संप्रभुता व राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम कर रही हैं।
रुबियो ने यह भी कहा कि कुछ संगठन जलवायु परिवर्तन, माइग्रेशन और विविधता जैसे मुद्दों पर जरूरत से ज्यादा जोर दे रहे हैं। व्हाइट हाउस के बयान में साफ किया गया है कि अमेरिका अब केवल उन्हीं वैश्विक मंचों में निवेश करेगा, जहां सीधे तौर पर अमेरिकी हितों को फायदा पहुंचे।
इस फैसले के साथ ही अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) से भी खुद को अलग कर लिया है। यही संधि आगे चलकर पेरिस जलवायु समझौते की आधारशिला बनी थी। गौरतलब है कि ट्रंप पहले भी जलवायु परिवर्तन को लेकर संदेह जता चुके हैं और अपने पहले कार्यकाल के दौरान पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट से अमेरिका को बाहर निकाल चुके थे।
अमेरिका के इस कदम की पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि अमेरिका जैसे बड़े प्रदूषक देश के बिना वैश्विक जलवायु संकट से निपटना और मुश्किल हो जाएगा। साथ ही यह फैसला दूसरे देशों को भी अपने जलवायु वादों से पीछे हटने का बहाना दे सकता है, जिससे वैश्विक प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं।