KNEWS DESK- बांग्लादेश की राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। एक ओर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के राजनीति से संन्यास लेने की तैयारियों की खबरें हैं, तो दूसरी ओर उनकी पार्टी आवामी लीग ने आने वाले आम चुनाव में एक अहम रणनीतिक फैसला लिया है। पार्टी ने सीधे चुनाव मैदान में उतरने के बजाय जातीय पार्टी को पर्दे के पीछे से समर्थन देने का निर्णय किया है। जातीय पार्टी पहले भी आवामी लीग के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ चुकी है।
द बिजनेस स्टैंडर्ड बांग्लादेश की रिपोर्ट के मुताबिक, आवामी लीग जातीय पार्टी के माध्यम से अपनी सियासी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश कर रही है। आगामी चुनाव में जातीय पार्टी ने आवामी लीग से जुड़े कई नेताओं को टिकट दिए हैं। इनमें इलियास हुसैन (तंगैल-1) और तारेक शम्स (तंगैल-6) जैसे नाम प्रमुख हैं।
बांग्लादेश में 12 फरवरी को 300 सीटों के लिए आम चुनाव प्रस्तावित हैं। सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 151 सीटों की जरूरत होगी।
शेख हसीना के बेटे साजिद वाजिद ने कहा है कि उनकी मां ने चुनाव से दूर रहने का फैसला पहले ही कर लिया था। उनके मुताबिक, बांग्लादेश में शेख हसीना के युग का अंत हो चुका है। वाजिद ने बताया कि यह फैसला उनकी मां ने स्वास्थ्य कारणों को देखते हुए लिया है। 78 वर्षीय शेख हसीना को 2024 में हुए एक विद्रोह के बाद ढाका छोड़कर देश से बाहर जाना पड़ा था।
वाजिद ने यह भी स्पष्ट किया कि शेख हसीना के बाद पार्टी की कमान किसके हाथ में होगी, इस पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। हालांकि उन्होंने कहा कि हसीना के हटने से आवामी लीग की लीडरशिप पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
उन्होंने कहा, “आवामी लीग बांग्लादेश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। इसे 70 साल हो चुके हैं। मेरी मां रहें या न रहें, पार्टी चलती रहेगी। कोई भी हमेशा के लिए नहीं रहता।”
माना जा रहा है कि चुनाव से पहले शेख हसीना औपचारिक तौर पर अपने संन्यास की घोषणा कर सकती हैं, जिससे वे अपने समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश करेंगी।
आवामी लीग के इस फैसले के पीछे कई राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं-
चुनाव पर बैन– बांग्लादेश में इस समय आवामी लीग के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा हुआ है। नवंबर में ‘प्रथम आलो’ द्वारा कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, करीब 26 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि आवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाए। इससे साफ है कि पार्टी का जनाधार अब भी मौजूद है।
बीएनपी-जमात गठबंधन का मुकाबला– इस बार का चुनाव मुख्य रूप से बीएनपी और जमात गठबंधन के बीच माना जा रहा है। दोनों ही शेख हसीना के कट्टर विरोधी रहे हैं। आवामी लीग किसी एक पक्ष को समर्थन देकर उसे राजनीतिक वैधता नहीं देना चाहती, इसलिए उसने तीसरे विकल्प के तौर पर जातीय पार्टी को चुना है।
किंगमेकर बनने की कोशिश– अगर शेख हसीना के समर्थन से जातीय पार्टी किंगमेकर की भूमिका में आती है, तो भविष्य में आवामी लीग के लिए ढाका की राजनीति में वापसी की राह आसान हो सकती है। साथ ही, इसका मकसद जमात को तीसरे नंबर पर धकेलना भी माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, भले ही शेख हसीना सक्रिय राजनीति से पीछे हटती नजर आ रही हों, लेकिन आवामी लीग की चुनावी रणनीति साफ संकेत देती है कि पार्टी बांग्लादेश की सियासत में अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिए हर संभव दांव खेलने को तैयार है।