शिव शंकर सविता- इलाहाबाद की संकरी गलियों में एक दुबला-पतला, शांत स्वभाव का बालक बड़ा हो रहा था। पिता शारदा प्रसाद एक साधारण विद्यालय शिक्षक थे और मां राम दुलारी देवी, जो बेटे को संस्कारों की पूंजी दे रही थीं। यही बालक आगे चलकर भारत का दूसरा प्रधानमंत्री बना—लाल बहादुर शास्त्री। 1906 में पिता के निधन के बाद मां बेटे को लेकर मुगलसराय चली आईं। कठिन हालात, सीमित संसाधन और जिम्मेदारियों के बीच शास्त्री का बचपन बीता। 1917 में बनारस के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में दाखिले के बाद उनके जीवन की दिशा बदलने लगी। शिक्षक निष्कामेश्वर मिश्रा की बातों ने उनमें राष्ट्रप्रेम की चिंगारी जला दी।
महात्मा गांधी के एक आव्हान पर छोड़ दिया स्कूल, दिया असहयोग आंदोलन में साथ
1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की पुकार आई। शास्त्री ने बिना झिझक स्कूल छोड़ दिया। जेल गए, संघर्ष झेला और फिर काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि ली। उन्होंने जातिसूचक उपनाम त्याग दिया और खुद को समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए समर्पित कर दिया। जन सेवक समाज से जुड़कर दलितों और वंचितों की सेवा करना उनके जीवन का लक्ष्य बन गया। राजनीति में वे बिना शोर-शराबे के आगे बढ़ते गए। कांग्रेस में जिम्मेदारियां मिलीं, मंत्री बने, जेल जाते रहे, लेकिन सादगी नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी रेल की सेकंड क्लास में सफर करने में उन्हें कोई संकोच नहीं था।
अकाल के समय सख्त फैसला, जो आज तक किया जाता है याद
1965 में पाकिस्तान से युद्ध छिड़ा। देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। तब शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने की अपील की और खुद सबसे पहले उसका पालन किया। उसी दौर में उन्होंने वह नारा दिया, जो आज भी भारत की आत्मा में गूंजता है—“जय जवान, जय किसान”। युद्ध के बाद शांति की जरूरत थी। सोवियत संघ की मध्यस्थता में भारत-पाक के बीच ताशकंद समझौता हुआ। 10 जनवरी 1966 को शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने दस्तखत किए। देश में आलोचना भी हुई, लेकिन शास्त्री ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। युद्ध के बाद शांति जरूरी थी। सोवियत संघ की मध्यस्थता से ताशकंद समझौता हुआ। 10 जनवरी 1966 को शास्त्री ने दस्तखत किए। आलोचना हुई, लेकिन उन्होंने कहा—राष्ट्र पहले।
अचानक बिगड़ी तबीयत, मिनटों में सब खत्म, सवालों को पीछे छोड़ गई शास्त्री जी की मौत
उस रात सब कुछ बदल गया। ताशकंद के सरकारी गेस्ट हाउस में अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी। कुछ मिनटों में सब खत्म हो गया। आधिकारिक कारण, दिल का दौरा। लेकिन सवालों की लिस्ट लंबी थी। पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ? शरीर पर नीले निशान कैसे आए? कमरे में फोन क्यों नहीं था? उनकी पत्नी ने जहर की आशंका क्यों जताई? जांच हुई, लेकिन नतीजा नहीं निकला। 2009 में सरकार ने कहा—रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं। पीएमओ की फाइलें आज भी बंद हैं। उनके डॉक्टर की रहस्यमयी मौत ने शक को और गहरा कर दिया। लाल बहादुर शास्त्री का जीवन एक खुली किताब है—ईमानदारी, त्याग और साहस से भरी। लेकिन उनकी मौत आज भी इतिहास का सबसे बड़ा सवाल है।