KNEWS DESK – क्या हो अगर एक सीधा-साधा, हालात से टूटा हुआ हवलदार जेल से सब्जियां चोरी करके किसी तरह अपनी जिंदगी चला रहा हो और उसी जेल में उसे उम्रकैद काट रही एक महिला से प्यार हो जाए? सुनने में यह किसी पुराने जमाने की इमोशनल कहानी लग सकती है, लेकिन ‘वध 2’ इससे कहीं आगे निकल जाती है। यह फिल्म सिर्फ प्रेम या आंसुओं की कहानी नहीं, बल्कि प्यार, सिस्टम की क्रूरता और क्राइम का ऐसा खतरनाक मेल है, जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग में घूमता रहता है।
फिल्म की शुरुआत भले ही धीमी लगे, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, आप समझ जाते हैं कि यह सन्नाटा किसी बड़े तूफान से पहले का है। अगर पहली ‘वध’ में संजय मिश्रा ने प्रभावित किया था, तो ‘वध 2’ में उनका काम और भी ज्यादा गहरा और डरावना है।
कहानी
‘वध 2’ की कहानी शंभूनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) के इर्द-गिर्द घूमती है। वह कोई हीरो नहीं, बल्कि सिस्टम का सताया हुआ एक मामूली हवलदार है, जिसकी कमर हालात ने तोड़ दी है। बेटा एनआरआई बनकर बाप से रिश्ता तोड़ चुका है, लेकिन पीछे छोड़ गया है भारी एजुकेशन लोन। मजबूरी इतनी बढ़ जाती है कि शंभूनाथ जेल के बगीचे से सब्जियां चुराकर बेचता है, ताकि घर चल सके।
इसी जेल में 28 साल से उम्रकैद काट रही है मंजू (नीना गुप्ता), जिस पर दो हत्याओं का आरोप है। दोनों के बीच एक शांत, बिना शोर-शराबे वाला रिश्ता बनता है—दो टूटे हुए इंसानों का एक-दूसरे का सहारा बन जाना। इन मुलाकातों में मदद करती है एक संवेदनशील महिला अधिकारी नफीसा।
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कहानी में असली मोड़ तब आता है, जब जेल में नए जेलर प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) की एंट्री होती है। वह जात-पात में विश्वास रखता है, लेकिन भ्रष्टाचार से नफरत करता है। इसी जेल में एक खतरनाक कैदी केशव का सिक्का चलता है, जो अचानक एक दिन गायब हो जाता है। हाई-सिक्योरिटी जेल से एक कैदी का यूं गायब होना पूरी कहानी को रहस्य और सस्पेंस के अंधेरे में धकेल देता है। इसके आगे क्या होता है, यह जानने के लिए फिल्म देखना जरूरी है।
कैसी है फिल्म?
‘वध 2’ एक आम आदमी की मजबूरी से जन्मे खतरनाक पलटवार की कहानी है। इसमें प्यार की मिठास भी है और बदले की ठंडक भी। फिल्म का सस्पेंस आपको ‘गुप्त’ की याद दिलाता है, जबकि भावनात्मक गहराई ‘लंच बॉक्स’ जैसी है। यह कहानी इसलिए असर करती है क्योंकि यह किसी सुपरहीरो की नहीं, बल्कि आम लोगों की है।
निर्देशन और लेखन
निर्देशक-लेखक जसपाल सिंह संधू ने साबित कर दिया है कि मजबूत कहानी के सामने बड़ा बजट मायने नहीं रखता। फिल्म का पेस संतुलित है और स्क्रिप्ट बेहद स्मार्ट। सुराग आपके सामने होते हैं, लेकिन आप उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं—और यही इसकी खूबसूरती है। संवाद सच्चे और जमीन से जुड़े हैं, जो किरदारों को और असली बना देते हैं।
एक्टिंग
संजय मिश्रा इस फिल्म की जान हैं। उनकी आंखों में झलकती थकान, दर्द और अचानक उभरती खतरनाक चमक आपको डराने लगती है। नीना गुप्ता ने मंजू के किरदार में कम बोलकर बहुत कुछ कह दिया है—उनका ठहराव और चुप्पी 28 साल का दर्द बयान करती है। कुमुद मिश्रा एक ऐसे पुलिस अधिकारी बने हैं, जिसे आप समझते भी हैं और उससे डरते भी हैं। अक्षय डोगरा ने केशव के किरदार में नफरत पैदा कर दी है, जबकि अमित के. सिंह जांच अधिकारी के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं।
अगर आपको ‘दृश्यम’ और ‘अंधाधुन’ जैसी दिमागी थ्रिलर पसंद हैं, तो ‘वध 2’ आपके लिए है। यहां न गनफाइट है, न शोर-शराबा—सिर्फ दिमाग का खेल है। अगर आप तेज रफ्तार, बड़े एक्शन और लार्जर-दैन-लाइफ सिनेमा के फैन हैं, तो यह फिल्म आपको धीमी लग सकती है।