2300 साल पुरानी ग्रैंड ट्रंक रोड की असली कहानी, शेरशाह सूरी नहीं थे इसके निर्माता

Knews Desk- भारत में आज हाईवे और एक्सप्रेस-वे का तेजी से विस्तार हो रहा है, लेकिन देश की सबसे ऐतिहासिक और प्राचीन सड़क की बात करें तो सबसे पहले नाम आता है ग्रैंड ट्रंक रोड (GT Road) का। आमतौर पर माना जाता है कि इस सड़क का निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था, जबकि इतिहास इसके पीछे कहीं अधिक पुरानी कहानी बताता है। इतिहासकारों के अनुसार, ग्रैंड ट्रंक रोड की जड़ें करीब 2300 साल पुरानी हैं और इसका मूल स्वरूप मौर्यकाल के प्रसिद्ध उत्तरापथ से जुड़ा हुआ था।

ग्रैंड ट्रंक रोड केवल एक सड़क नहीं, बल्कि सदियों तक दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक, सांस्कृतिक और सैन्य जीवनरेखा रही। इसका प्राचीन मार्ग वर्तमान बांग्लादेश के चटगांव से शुरू होकर भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। भारत में यह मार्ग कोलकाता, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, दिल्ली, अमृतसर होते हुए लाहौर, पेशावर और काबुल तक जाता था। इसी वजह से इसे एशिया के सबसे महत्वपूर्ण संपर्क मार्गों में गिना जाता है।इतिहासकारों का मानना है कि इस सड़क की शुरुआत मौर्य साम्राज्य के दौर में हुई थी। चंद्रगुप्त मौर्य और बाद में सम्राट अशोक ने विशाल साम्राज्य को जोड़ने, व्यापार बढ़ाने, सेना की आवाजाही और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए इस मार्ग का विकास कराया। उस समय इसे उत्तरापथ कहा जाता था। इसी रास्ते से व्यापारी, सैनिक, साधु, विद्वान और विदेशी यात्री भारत के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचते थे।

हालांकि, ग्रैंड ट्रंक रोड का नाम आते ही सबसे पहले शेरशाह सूरी का जिक्र होता है। लेकिन यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि उन्होंने इस सड़क का निर्माण कराया था। शेरशाह सूरी का शासनकाल केवल 1540 से 1545 तक यानी करीब पांच वर्ष का था। इतने कम समय में हजारों किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण संभव नहीं था। इतिहास बताता है कि उन्होंने पहले से मौजूद प्राचीन मार्ग का व्यापक विकास और पुनर्निर्माण कराया।शेरशाह सूरी ने इस सड़क को व्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने मार्ग को चौड़ा कराया, जगह-जगह सराय, कुएं, पेड़ और डाक चौकियां बनवाईं। इसके अलावा यात्रियों को दूरी का अंदाजा लगाने के लिए कोस मीनारों का निर्माण कराया। उस समय एक कोस लगभग तीन किलोमीटर के बराबर माना जाता था। उनकी इन व्यवस्थाओं ने ग्रैंड ट्रंक रोड को उस दौर की सबसे आधुनिक सड़कों में शामिल कर दिया।

बाद में मुगल शासकों ने भी इस मार्ग का व्यापक उपयोग किया। दिल्ली, आगरा, लाहौर और अन्य प्रमुख शहरों के बीच सेना की आवाजाही और व्यापार के लिए यह सड़क बेहद महत्वपूर्ण रही। कपड़ा, मसाले, अनाज, घोड़े और अन्य सामान इसी मार्ग से देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाए जाते थे। इस सड़क ने केवल व्यापार ही नहीं, बल्कि संस्कृति, भाषा और परंपराओं के आदान-प्रदान में भी बड़ी भूमिका निभाई।ब्रिटिश शासन के दौरान ग्रैंड ट्रंक रोड को आधुनिक स्वरूप दिया गया। अंग्रेजों ने कई हिस्सों को पक्का कराया, नए पुल बनाए और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाया। सेना और व्यापारिक गतिविधियों को तेज करने के लिए इस सड़क का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। हालांकि रेलवे नेटवर्क विकसित होने के बाद इसका स्वरूप बदला, लेकिन इसका महत्व कम नहीं हुआ।

आज ग्रैंड ट्रंक रोड अपने पुराने स्वरूप में पूरी तरह मौजूद नहीं है। इसका बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्ग-19 (NH-19) और राष्ट्रीय राजमार्ग-44 (NH-44) सहित कई आधुनिक हाईवे का हिस्सा बन चुका है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आज भी कई स्थानों पर इसे जीटी रोड के नाम से जाना जाता है।इतिहासकार मानते हैं कि ग्रैंड ट्रंक रोड भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यह सड़क केवल एक मार्ग नहीं रही, बल्कि सदियों तक लोगों, राज्यों, व्यापार, सभ्यताओं और संस्कृतियों को जोड़ने वाली जीवनरेखा बनी रही। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ग्रैंड ट्रंक रोड की नींव मौर्यकाल में पड़ी थी, जबकि शेरशाह सूरी ने उसे नया स्वरूप और व्यवस्थित पहचान दी। यही वजह है कि 2300 साल बाद भी यह ऐतिहासिक सड़क भारत के गौरवशाली इतिहास की महत्वपूर्ण निशानी मानी जाती है।

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