डिजिटल डेस्क- मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और जंग जैसे हालात के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने वैश्विक राजनीति और तेल बाजार दोनों को चौंका दिया है। एक ओर अमेरिका जहां ईरान को अलग-थलग करने की रणनीति पर काम कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उसने समुद्र में फंसे ईरानी तेल को सीमित समय के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने की अनुमति दे दी है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के इस फैसले के तहत 20 मार्च 2026 से पहले टैंकरों में लोड किए गए ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों को 19 अप्रैल 2026 तक बेचा जा सकेगा। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बिसेंट ने इसे “सीमित दायरे में लिया गया रणनीतिक फैसला” बताया है, जिसका मकसद वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर होने से बचाना है।
वैश्विक बाजार में देखने को मिल रही तेल की भारी कमी
दरअसल, हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और आपूर्ति बाधित होने के कारण वैश्विक बाजार में तेल की भारी कमी देखने को मिल रही है। अनुमान के मुताबिक, इस संकट के चलते दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। ऐसे में अमेरिका इस ‘फंसे हुए’ ईरानी तेल को बाजार में लाकर सप्लाई गैप को भरना चाहता है। जानकारी के अनुसार, इस समय करीब 140 मिलियन (14 करोड़) बैरल ईरानी तेल समुद्री टैंकरों में फंसा हुआ है। यह मात्रा वैश्विक बाजार की लगभग 10 से 14 दिनों की जरूरतों को पूरा कर सकती है। अमेरिका का मानना है कि इस तेल को बाजार में उतारने से कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सकेगा और महंगाई के दबाव को कम किया जा सकेगा।
ट्रंप के दोहरे फैसले से दुनिया हैरान
हालांकि, इस फैसले ने अमेरिका की नीतियों पर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। एक तरफ अमेरिका ईरान के खिलाफ कड़े प्रतिबंध और सैन्य रणनीतियां लागू कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसी के तेल को बाजार में लाने की अनुमति दे रहा है। विशेषज्ञ इसे “रणनीतिक विरोधाभास” बता रहे हैं। अमेरिका का तर्क है कि यह कदम ईरान को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि चीन जैसे देशों के प्रभाव को कम करने के लिए उठाया गया है। दरअसल, अब तक ईरान अपना प्रतिबंधित तेल सस्ते दामों पर चीन को बेच रहा था। ऐसे में अमेरिका इस सप्लाई को वैश्विक बाजार के लिए खोलकर चीन के एकाधिकार को कमजोर करना चाहता है। यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने ऐसा कदम उठाया हो। इससे पहले भी उसने प्रतिबंधित रूसी तेल को सीमित छूट देकर बाजार में उतारने की अनुमति दी थी, जिससे बड़ी मात्रा में सप्लाई बढ़ाई गई थी।