डिजिटल डेस्क- सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) से जुड़े एक पुराने फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) यूनाइटेड वॉइस फॉर एजुकेशन फोरम पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की याचिकाएं न केवल सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता को चुनौती देती हैं, बल्कि देश की न्यायिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास भी करती हैं। 2014 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को RTE अधिनियम के कुछ प्रावधानों से छूट देने का निर्णय दिया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए NGO ने रिट याचिका दायर की, जिस पर कोर्ट तीखा रवैया अपनाते हुए बोला कि संविधान पीठ के आदेश के खिलाफ कोई रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। पीठ की अध्यक्षता कर रहीं जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान कहा, “आप सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को इसी अदालत में चुनौती देने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? यह न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है। ऐसे मामले दायर करके आप पूरी न्यायपालिका को गिराने की कोशिश कर रहे हैं।”
गलत सलाह देने वाले वकीलों पर भी अब दंड लगाया जाएगा
उन्होंने आगे कहा कि अदालत ऐसे प्रयासों को बर्दाश्त नहीं करेगी और गलत सलाह देने वाले वकीलों पर भी अब दंड लगाया जाएगा। अदालत ने कहा कि यदि ऐसी याचिकाएं स्वीकार की जाने लगीं तो पूरा न्यायिक ढांचा ठप हो जाएगा। जस्टिस नागरत्ना ने याचिकाकर्ता को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को उसी अदालत में रिट से चुनौती देना कानून की बुनियादी समझ के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि अदालत आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकती थी, लेकिन फिलहाल ऐसा न करते हुए केवल जुर्माना लगाया जा रहा है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह बेहद चिंताजनक है कि कुछ लोग न्यायिक प्रक्रिया को हल्के में ले रहे हैं। हम अपने ही फैसलों के खिलाफ दायर रिट को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करेंगे।”
वकीलों की भूमिका संदेहास्पद- सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में शामिल वकीलों की भूमिका संदेहास्पद है और भविष्य में अदालत गलत कानूनी सलाह देने वाले अधिवक्ताओं पर भी आर्थिक दंड लगाने में संकोच नहीं करेगी। इस निर्णय को न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और निर्णयों की अंतिमता (finality) की रक्षा के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत का यह कदम उन प्रवृत्तियों पर सख्त संदेश है, जहां लोग संवैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग करने की कोशिश करते हैं।