KNEWS DESK – ग्रेटर नोएडा को अक्सर उत्तर प्रदेश की ‘शो-विंडो’ और ‘स्मार्ट सिटी’ कहा जाता है। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बड़े-बड़े दावे… लेकिन इन्हीं दावों के नीचे लापरवाही के ऐसे गड्ढे भी हैं, जो अब मासूम जिंदगियां निगल रहे हैं। दलेलगढ़ गांव में 3 साल के देवांश की मौत ने एक बार फिर प्रशासनिक संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
मंदिर के पास बना ‘डेथ ट्रैप’
गांव में मंदिर के पास करीब 15-20 फीट गहरा गड्ढा छह साल पहले मिट्टी निकालने के लिए खोदा गया था। काम खत्म हुआ, मिट्टी बिक गई, लेकिन गड्ढा जस का तस छोड़ दिया गया। बरसात और जलभराव से यह पानी से लबालब भरता रहा।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार शिकायत की या तो इसे भर दिया जाए या चारदीवारी कर दी जाए। लेकिन फाइलें नहीं हिलीं।
भंडारे में आया था मासूम
रविवार को मंदिर में भंडारा था। देवांश अपनी मां अंजलि के साथ वहां पहुंचा था। खेलते-खेलते वह पानी से भरे उसी गड्ढे की ओर चला गया। पैर फिसला और वह गहराई में चला गया। काफी देर तक तलाश के बाद पुलिस और प्रशासन की टीम ने रेस्क्यू किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में देवांश सिस्टम की अनदेखी का शिकार बन गया।
4 जनवरी 2026 को ग्राम दलेलगढ़ विकास समिति की ओर से आसपास के गड्ढों को भरने और जलभराव हटाने की लिखित शिकायत दी गई थी। 14 फरवरी की दोपहर हादसा हुआ, और शिकायत का जवाब एक मासूम की मौत बनकर सामने आया।
पहले भी दोहराया गया ‘पैटर्न’
ग्रेटर नोएडा में यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले सेक्टर-150 में भी खुले गड्ढे में डूबकर एक बच्चे की जान गई थी। तब बड़े दावे हुए, जांच और सुरक्षा के वादे किए गए। लेकिन दलेलगढ़ की घटना बताती है कि जमीनी हालात नहीं बदले।
प्राधिकरण ने बयान जारी कर कहा कि जिस जमीन पर गड्ढा है, वह सरकारी तालाब नहीं बल्कि गांव के एक किसान के नाम दर्ज है। हालांकि सवाल यह है कि छह साल से खुले और खतरनाक गड्ढे पर निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी?