शिव शंकर सविता- कानपुर में सामने आया किडनी ट्रांसप्लांट कांड कोई अचानक उजागर हुआ मामला नहीं, बल्कि यह वर्षों से चल रहे एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा बताया जा रहा है। शुरुआती शिकायत से लेकर अब तक की जांच में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने जिस तरह से परत-दर-परत खुलासे किए हैं, उससे यह साफ हुआ है कि यह पूरा रैकेट सुनियोजित तरीके से काम कर रहा था और इसमें कई अस्पतालों, डॉक्टरों और दलालों की मिलीभगत शामिल थी। मामले की शुरुआत उस समय हुई जब किडनी डोनर और दलाल के बीच पैसों के लेन-देन को लेकर विवाद सामने आया। इसी विवाद ने पूरे नेटवर्क की पोल खोल दी। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने जब जांच शुरू की तो सबसे पहले एक निजी अस्पताल और उससे जुड़े लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी गई। शुरुआती पूछताछ में ही संकेत मिले कि किडनी ट्रांसप्लांट के नाम पर लंबे समय से अवैध गतिविधियां संचालित हो रही थीं।

योजनाबद्ध तरीका और गोपनीय प्रकिया… ताकि न हो किसी को शक
जांच में सामने आया कि यह पूरा खेल बेहद योजनाबद्ध तरीके से चलता था। ट्रांसप्लांट के दिन अस्पताल का अधिकांश स्टाफ पहले ही घर भेज दिया जाता था ताकि किसी बाहरी व्यक्ति को कोई संदेह न हो। इसके बाद दिल्ली और अन्य शहरों से विशेष डॉक्टरों की टीम रात के समय कानपुर आती थी और ऑपरेशन को अंजाम देकर वापस लौट जाती थी। यह प्रक्रिया इतनी गोपनीय तरीके से होती थी कि अस्पताल के अंदर भी सीमित लोगों को ही इसकी जानकारी होती थी। डोनर और रिसीवर की पहचान दलालों के माध्यम से कराई जाती थी। बेरोजगार और जरूरतमंद युवाओं को पैसे का लालच देकर इस रैकेट में शामिल किया जाता था। जांच में यह भी सामने आया कि एक डोनर को किडनी देने के लिए 4 से 6 लाख रुपये तक का वादा किया जाता था, जबकि इस पूरे ट्रांसप्लांट सौदे की कीमत 60 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक होती थी। बाकी रकम डॉक्टरों, अस्पताल संचालकों और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों में बांट दी जाती थी।

टेलीग्राम और अन्य सोशल मीडिया साइट्स का लिया जाता था सहारा
इस रैकेट में तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा था। टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर ग्रुप बनाकर देशभर के डॉक्टरों और दलालों को जोड़ा गया था। इन ग्रुप्स में मरीजों की जानकारी साझा की जाती थी और जरूरत के अनुसार डोनर तलाशे जाते थे। इस तरह यह नेटवर्क दिल्ली, मेरठ, लखनऊ, बिहार, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल तक फैला हुआ था। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कानपुर में कई अस्पताल इस नेटवर्क का हिस्सा थे। बिना उचित अनुमति और नियमों के कई जगहों पर ट्रांसप्लांट किए जा रहे थे। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने जब छापेमारी की तो कई अहम दस्तावेज और सबूत मिले, जिससे यह साबित हुआ कि यह गतिविधियां लंबे समय से चल रही थीं।

डोनर-रिसीवर के विवाद ने खोली परत… पुलिस जांच में हुआ भंडाफोड़
इस पूरे मामले का एक बड़ा मोड़ तब आया जब एक डोनर आयुष और रिसीवर पारुल के बीच विवाद हुआ। आयुष को किडनी देने के बदले तय राशि नहीं मिली, जिसके बाद उसने शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत ने पुलिस को पूरे नेटवर्क तक पहुंचने का रास्ता दिया। जांच में पता चला कि आयुष मेरठ का रहने वाला है और उसे दलालों ने पैसे का लालच देकर इस सौदे में शामिल किया था। जांच आगे बढ़ी तो पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया और पूछताछ के आधार पर छापेमारी तेज कर दी। पुलिस ने आहूजा अस्पताल और उससे जुड़े अन्य अस्पतालों को जांच के दायरे में लिया। इसके अलावा, यह भी सामने आया कि एक अन्य अस्पताल से मरीज को बिना जरूरी प्रक्रिया पूरी किए ट्रांसफर किया गया था, जो नियमों का गंभीर उल्लंघन था।

अबतक 6 गिरफ्तार, कई राज्यों में नेटवर्क का संदेह
स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में अंततः छह लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें अस्पताल संचालक, डॉक्टर और मुख्य दलाल शामिल हैं। गिरफ्तार आरोपियों पर आरोप है कि वे संगठित तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट का अवैध कारोबार चला रहे थे और इसके लिए देशभर में अपना नेटवर्क फैला रखा था। जांच अधिकारियों का कहना है कि यह मामला केवल कानपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार कई राज्यों से जुड़े हो सकते हैं। फिलहाल, पुलिस इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इसमें और कौन-कौन लोग शामिल हैं।