सोनम वांगचुक की हिरासत चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट में 12 जनवरी को करेगा सुनवाई

डिजिटल डेस्क- सुप्रीम कोर्ट ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के लिए 12 जनवरी की तारीख निर्धारित की है। यह याचिका वांगचुक की पत्नी गीताांजलि ने दायर की है, जिसमें उनके पति की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत की गई हिरासत को चुनौती दी गई है। याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि वांगचुक को हिरासत में लेने वाली अधिकारी ने उन्हें 28 दिन तक हिरासत का औचित्य या आधार उपलब्ध नहीं कराया। सिब्बल ने बताया कि कानून के अनुसार, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को हिरासत के कारण अधिकतम 10 दिनों के भीतर जानकारी दी जानी अनिवार्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने जानबूझकर वांगचुक के खिलाफ तथ्यों और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की और उन्हें पूर्ण दस्तावेज नहीं मुहैया कराए।

सोनम वांगचुक का उद्देश्य संवैधानिक रूप से आवाज उठाना ही था- कपिल सिब्ब्ल

सिब्बल ने आगे कहा कि वांगचुक को बाद में पेन ड्राइव दी गई, लेकिन उसमें चार महत्वपूर्ण वीडियो शामिल नहीं थे, जिनके आधार पर उन्हें हिरासत में लिया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि ये छेड़छाड़ वांगचुक को अवैध हिरासत में रखने के उद्देश्य से की गई। सुप्रीम कोर्ट में वांगचुक के पक्ष से दलील दी गई कि 24 सितंबर 2025 को उनके द्वारा दिए गए भाषण में हिंसा के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं था। उन्होंने हिंसा की खुले तौर पर निंदा की और सामाजिक अशांति के प्रति अपनी चिंता जाहिर की थी। सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि हिंसा की घटनाओं से व्यथित होकर वांगचुक ने अपना अनशन भी तोड़ दिया था, यह दर्शाता है कि उनका उद्देश्य शांतिपूर्ण और संवैधानिक रूप से ही अपनी आवाज उठाना था।

12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में अपने-अपने तर्क पेश करेंगे दोनों पक्ष

याचिका में यह भी जोर दिया गया कि एनएसए के तहत हिरासत का उपयोग केवल राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीर स्थिति में ही होना चाहिए। वांगचुक की हिरासत में अनियमितताएं और उन्हें पर्याप्त आधार न प्रदान करना कानून और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट के 12 जनवरी के सुनवाई में याचिकाकर्ता और केंद्र सरकार के वकील दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क पेश करेंगे। यह सुनवाई न केवल वांगचुक के व्यक्तिगत अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, बल्कि एनएसए के दुरुपयोग और नागरिक स्वतंत्रताओं के संरक्षण के लिहाज से भी इसे अहम माना जा रहा है।

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