भारत में WhatsApp पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: यूज़र प्राइवेसी बनाम बिग टेक की मनमानी पर लगाई फटकार

डिजिटल डेस्क- भारत में शायद ही कोई स्मार्टफोन यूज़र होगा जो WhatsApp का इस्तेमाल न करता हो। चैटिंग से लेकर कॉल, ऑफिस का काम, फैमिली ग्रुप और यहां तक कि सरकारी सूचनाओं तक WhatsApp आज देश की डिजिटल ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन अब यही ऐप सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में है और अदालत की नाराज़गी साफ नजर आ रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp और उसकी पेरेंट कंपनी Meta को कड़ी चेतावनी दी। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी कंपनी को भारतीय नागरिकों के प्राइवेसी के मौलिक अधिकार के साथ खेलने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। यहां तक कि जजों ने यह भी कहा कि अगर कंपनी भारतीय कानूनों का पालन नहीं कर सकती, तो उसके पास भारत छोड़ने का विकल्प खुला है।

अचानक अदालत इतनी सख्त क्यों?

इस सख्ती की जड़ WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी है। WhatsApp सालों से दावा करता रहा है कि उसके मैसेज End-To-End Encrypted (E2EE) हैं, यानी कोई तीसरा व्यक्ति चैट नहीं पढ़ सकता। लेकिन विवाद मैसेज के कंटेंट को लेकर नहीं, बल्कि यूज़र डेटा और मेटाडेटा को लेकर है। नई पॉलिसी के तहत WhatsApp यह मानता है कि वह यूज़र का मेटाडेटा किससे बात हुई, कब और कितनी बार हुई, डिवाइस की जानकारी और तकनीकी डिटेल्स Meta की अन्य कंपनियों, जैसे Facebook और Instagram, के साथ शेयर कर सकता है। सरकार और अब सुप्रीम कोर्ट का सवाल यही है कि भारत में करोड़ों यूज़र्स का डेटा आखिर किस हद तक और किस मकसद से इस्तेमाल किया जा रहा है।

‘Take it or leave it’ रवैया क्यों खटक रहा है?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp के रवैये पर सीधी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि कोई कंपनी यूज़र्स से यह नहीं कह सकती कि “पॉलिसी मानो या ऐप छोड़ दो।” भारत में WhatsApp सिर्फ एक ऐप नहीं, बल्कि एक तरह का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बन चुका है। छोटे दुकानदार, स्कूल, दफ्तर और सरकारी संस्थान तक इसी पर निर्भर हैं। ऐसे में यूज़र के पास वास्तव में कोई विकल्प नहीं बचता। अदालत के मुताबिक, जब किसी प्लेटफॉर्म की पहुंच इतनी व्यापक हो, तो उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

सरकार की चिंता क्या है?

भारत सरकार का रुख पहले से साफ रहा है यूज़र डेटा भारत में ही रहे और भारतीय कानूनों के तहत इस्तेमाल हो। आशंका यह है कि डेटा विदेशों में स्टोर होता है और Meta जैसे ग्लोबल प्लेटफॉर्म अपने बिजनेस मॉडल, विज्ञापन, डेटा प्रोफाइलिंग और भविष्य में AI सिस्टम ट्रेन करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी दो टूक कहा कि प्राइवेसी कोई लग्ज़री नहीं, बल्कि संविधान से जुड़ा मौलिक अधिकार है।

WhatsApp की दलील

WhatsApp का कहना है कि चैट कंटेंट पूरी तरह सुरक्षित है और वह न तो सरकार को और न ही Meta को मैसेज देता है। कंपनी का तर्क है कि उसकी पॉलिसी ग्लोबल है और भारत के लिए अलग नियम बनाना संभव नहीं। लेकिन अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं है। कोर्ट का मानना है कि भारत का कानून और यूज़र बेस इतना बड़ा है कि “ग्लोबल पॉलिसी” का बहाना नहीं चल सकता। यह मामला सिर्फ WhatsApp या टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं है। यह लड़ाई कंट्रोल की है—क्या विदेशी Big Tech कंपनियां भारत में बिजनेस करेंगी लेकिन नियम अपने बनाएंगी? सरकार और अदालत दोनों संकेत दे चुके हैं कि भारत अब “डेटा कॉलोनी” नहीं बनेगा।

आम यूज़र को क्यों फर्क पड़ता है?

कई लोग सोचते हैं कि “हमें क्या, हम तो सिर्फ चैट करते हैं।” लेकिन आज के दौर में डेटा ही असली ताकत है। आपकी ऑनलाइन आदतें, बातचीत का पैटर्न और पसंद-नापसंद यह तय करती हैं कि आपको क्या दिखाया जाएगा और कैसे प्रभावित किया जाएगा।

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद WhatsApp के सामने दो ही रास्ते हैं—या तो वह अपनी प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव करे, या फिर भारत सरकार के साथ किसी बीच के समाधान पर पहुंचे। यह भी संभव है कि भारत के लिए अलग डेटा नियम लागू किए जाएं, जैसा कई देश करते हैं।

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