डिजिटल डेस्क- दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने कॉमेडियन कुणाल कामरा को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में जारी किया गया है। यह कार्रवाई शिवसेना के दिल्ली प्रदेश प्रमुख संदीप चौधरी द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन पर सुनवाई के दौरान की गई। इस मामले ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक व्यंग्य की सीमाओं को लेकर बहस तेज कर दी है। रोहिणी कोर्ट की एडिशनल सेशंस जज (ASJ) वंदना ने 20 जनवरी 2026 को यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने कुणाल कामरा को नोटिस जारी करते हुए सात दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 20 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है। यह पिटीशन उस मजिस्ट्रेटी आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें पुलिस को कुणाल कामरा के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया गया था।
शिवसेना नेता संदीप चौधरी ने अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने का लगाया था आरोप
दरअसल, शिवसेना नेता संदीप चौधरी ने आरोप लगाया है कि कुणाल कामरा ने “नया भारत” नामक एक व्यंग्यात्मक वीडियो बनाया, जिसमें उन्होंने एकनाथ शिंदे के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया। याचिका के अनुसार, वीडियो में “गद्दार”, “दलबदलू” और “फडणवीस की गोदी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, जिससे राजनीतिक समूहों के बीच नफरत और दुश्मनी को बढ़ावा देने की कोशिश की गई। इसी आधार पर कामरा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी। हालांकि, इससे पहले 15 सितंबर 2025 को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास हिमांशु सहलोथ ने इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए याचिका को खारिज कर दिया था। मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत दायर अर्जी को अस्वीकार करते हुए कहा था कि कुणाल कामरा द्वारा किया गया कंटेंट सटायर और पॉलिटिकल पैरोडी के दायरे में आता है। उन्होंने माना था कि यह शिवसेना के भीतर हुए कथित दलबदल और राजनीतिक गठबंधन पर टिप्पणी थी।
खराब भाषण पर मजबूत तर्क होना जरूरी- कोर्ट
जज सहलोथ ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि इस्तेमाल की गई भाषा कुछ लोगों को आपत्तिजनक या असहज लग सकती है, लेकिन इसे संज्ञेय अपराध नहीं माना जा सकता। उन्होंने टिप्पणी की थी कि व्यंग्य कभी-कभी चुभ सकता है और मर्यादा की सीमाएं भी लांघ सकता है, लेकिन खराब भाषण का जवाब पुलिस की कार्रवाई नहीं, बल्कि बेहतर और मजबूत तर्क होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि सार्वजनिक पदों पर बैठे नेताओं को आलोचना सहने की क्षमता रखनी चाहिए, क्योंकि वे एक स्वतंत्र समाज में शासन करते हैं। इसी आदेश को चुनौती देते हुए संदीप चौधरी ने ASJ वंदना की अदालत में क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन दाखिल की थी। अब इस पिटीशन पर नोटिस जारी होने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह केस राजनीतिक व्यंग्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के दायरे को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।