डिजिटल डेस्क- मुंबई की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने रेलवे प्रशासन को सीधे चेतावनी देते हुए रत्नागिरी पैसेंजर ट्रेन को फिर से दादर तक चलाने की मांग उठाई है। पार्टी ने इस मांग को लेकर 15 से 20 दिनों का अल्टीमेटम दिया है और साफ कहा है कि अगर तय समय सीमा में मांग पूरी नहीं हुई, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जाने वाली ट्रेनों को रोका जा सकता है। इस पूरे विवाद के केंद्र में मुंबई से कोंकण क्षेत्र को जोड़ने वाली रत्नागिरी पैसेंजर ट्रेन है, जो पहले दादर स्टेशन से सीधे रत्नागिरी तक चलती थी। यह ट्रेन खासतौर पर मुंबई में रहने और काम करने वाले कोंकण क्षेत्र के लोगों के लिए बेहद अहम मानी जाती थी।
दिवा तक सीमित होने से बढ़ी परेशानी
बीते कुछ वर्षों में रेलवे प्रशासन ने इस ट्रेन को दादर से हटाकर ठाणे जिले के दिवा स्टेशन तक सीमित कर दिया। इस फैसले के पीछे रेलवे ने कोई ठोस कारण सार्वजनिक नहीं किया, जिससे यात्रियों में नाराजगी बनी हुई है। मनसे का आरोप है कि इस बदलाव से हजारों यात्रियों को रोजाना अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ रही है। पहले जहां यात्री सीधे दादर से ट्रेन पकड़ लेते थे, वहीं अब उन्हें अलग से समय और पैसा खर्च करके दिवा तक जाना पड़ता है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इसका सबसे ज्यादा असर कामकाजी लोगों, बुजुर्गों और रोजाना यात्रा करने वाले यात्रियों पर पड़ रहा है।
‘कोंकण के लोगों के साथ अन्याय’
मनसे प्रमुख राज ठाकरे की पार्टी का कहना है कि यह सिर्फ एक ट्रेन का मुद्दा नहीं, बल्कि कोंकण क्षेत्र के लोगों के साथ अन्याय है। उनका आरोप है कि कोरोना काल के दौरान इस ट्रेन को बंद किया गया था, लेकिन सेवाएं बहाल होने के बाद भी इसे दादर तक शुरू नहीं किया गया। पार्टी ने दावा किया है कि उन्होंने कई बार रेलवे अधिकारियों के सामने यह मुद्दा उठाया, लेकिन हर बार उनकी मांगों को नजरअंदाज कर दिया गया।
आंदोलन की चेतावनी, माहौल गर्म
अब मनसे ने इस मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपना लिया है। पार्टी नेताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि 15-20 दिनों के भीतर रत्नागिरी पैसेंजर को फिर से दादर तक नहीं चलाया गया, तो वे उत्तर भारत खासतौर पर यूपी और बिहार जाने वाली ट्रेनों को रोकने जैसे कड़े कदम उठाएंगे। इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मनसे अपने ऐलान पर अमल करती है, तो यह मामला कानून-व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन सकता है। फिलहाल इस पूरे विवाद पर रेलवे प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, बढ़ते दबाव को देखते हुए आने वाले दिनों में रेलवे को इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाना पड़ सकता है।