मौनी अमावस्या पर शंकराचार्य की पालकी रोके जाने से बवाल, मौन व्रत पर बैठे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, अन्न-जल भी त्यागा

शिव शंकर सविता- उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से माघ मेला 2025 के दौरान एक बड़ी और संवेदनशील खबर सामने आई है। मौनी अमावस्या के महास्नान पर्व पर ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम में स्नान नहीं कर सके, जिसके बाद मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शंकराचार्य के संगम स्नान से वंचित रहने और उनकी पालकी रोके जाने को लेकर न सिर्फ संत समाज में नाराजगी है, बल्कि प्रशासन पर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद शंकराचार्य के मौन व्रत और अन्न-जल त्याग की खबर ने सियासी और धार्मिक हलकों में हलचल मचा दी है। सूत्रों के मुताबिक, रविवार को हुई घटना के बाद से ही शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मौन व्रत धारण कर लिया है और अन्न-जल का त्याग भी किया है। बताया जा रहा है कि सोमवार दोपहर 12 बजे शंकराचार्य अपने अगले कदम और आगे की रणनीति को लेकर कोई बड़ा ऐलान कर सकते हैं। वहीं, माघ मेला क्षेत्र में रविवार को पूरे दिन शंकराचार्य की पालकी रोके जाने का मामला चर्चा का विषय बना रहा।

रविवार को पुलिसकर्मियों और अनुनायियों में हुई थी धक्का-मुक्की

दरअसल, मौनी अमावस्या के दिन रविवार सुबह करीब 9 बजकर 47 मिनट पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने अनुयायियों के साथ संगम नोज पहुंचे थे। शंकराचार्य पालकी पर सवार थे, जबकि उनके सैकड़ों अनुयायी पैदल चल रहे थे। मौनी अमावस्या के अवसर पर भारी भीड़ को देखते हुए संगम नोज पर बैरिकेडिंग की गई थी। पुलिस अधिकारियों ने सुरक्षा का हवाला देते हुए शंकराचार्य की पालकी को बैरिकेडिंग के पास ही रोक दिया। पुलिस की ओर से शंकराचार्य से कहा गया कि वे पालकी से उतरकर पैदल संगम तक जाएं और सीमित संख्या में अनुयायियों के साथ स्नान करें। संगम नोज से स्नान स्थल की दूरी करीब 50 मीटर बताई गई। इस बात पर शंकराचार्य के अनुयायी नाराज हो गए और विरोध शुरू हो गया। देखते ही देखते धक्का-मुक्की और नोकझोंक शुरू हो गई, जो संगम वाच टावर तक पहुंच गई। करीब तीन घंटे तक संगम तट पर खींचतान, हंगामा और बहस का माहौल बना रहा। अंततः शंकराचार्य बिना स्नान किए वापस लौट गए।

शंकराचार्य के साथ कई संतों ने भी त्यागा अन्न-जल

घटना से आहत शंकराचार्य ने त्रिवेणी मार्ग स्थित अपने शिविर के बाहर समर्थकों के साथ धरना शुरू कर दिया। सूर्यास्त के बाद उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया। उनके समर्थकों का दावा है कि शंकराचार्य और धरने पर बैठे संतों ने अन्न-जल का भी त्याग कर दिया है। इस पूरे मामले पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मीडिया से बातचीत में गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वे पिछले करीब 40 वर्षों से संगम स्नान करते आ रहे हैं और शंकराचार्य बनने के बाद बीते तीन वर्षों से पालकी पर सवार होकर संगम जाते हैं। उन्होंने बताया कि पालकी पर बैठने का कारण यह है कि श्रद्धालु दर्शन के लिए अत्यधिक पास आ जाते हैं, जिससे भगदड़ जैसी स्थिति बन सकती है। पालकी पर होने से लोग दूर से ही दर्शन कर लेते हैं।

शंकराचार्य का आरोप- भगदड़ मचाकर नुकसान पहुंचाने की थी साजिश

शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि पुलिस और प्रशासन उन्हें पैदल चलवाकर नीचा दिखाना चाहते थे। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने भगदड़ की स्थिति बनाकर उन्हें नुकसान पहुंचाने की साजिश की। उन्होंने दावा किया कि बिना वर्दी के पुलिसकर्मी उन्हें जबरन वहां से हटाने की कोशिश कर रहे थे। शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि वे तभी संगम स्नान करेंगे, जब बदसलूकी करने वाले अधिकारी उन्हें ससम्मान संगम तक ले जाएंगे। उन्होंने मेला छोड़ने की चेतावनी भी दी। वहीं, प्रयागराज पुलिस कमिश्नर जोगेंद्र कुमार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि शंकराचार्य लगभग 200 अनुयायियों के साथ संगम नोज जाना चाहते थे, जबकि प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से केवल 20 अनुयायियों के साथ पैदल जाकर स्नान करने का आग्रह किया था। पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, शंकराचार्य और उनके समर्थक इस पर सहमत नहीं हुए और उनके अनुयायियों ने पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी की।

पुलिस आयुक्त ने कहा कि माघ मेले में पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था कि कोई नई परंपरा शुरू नहीं की जाएगी। पूरी घटना के वीडियो फुटेज की जांच की जा रही है और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। इस बीच, मंडलायुक्त, डीएम और मेला अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और शंकराचार्य को समझाने की कोशिश की, लेकिन सहमति नहीं बन सकी। फिलहाल यह मामला प्रशासन और संत समाज के बीच टकराव का रूप ले चुका है और आने वाले समय में इस पर बड़ा फैसला या ऐलान होने की संभावना जताई जा रही है।